दीवाना दीवाना, मैं तेरी सादगी का दीवाना

सादगी में जो सौंदर्य छिपा होता है, वह किसी आडंबर का मोहताज नहीं होता।इन्हीं निर्मल भावों को समर्पित मेरी नवीन स्वरचित श्रृंगार रचना -“दीवाना दीवाना, मैं तेरी सादगी का दीवाना”आशा है आप सभी को यह भाव-सुमन पसंद आएगा।

दीवाना दीवाना, मैं तेरी सादगी का दीवाना

कुमार महेंद्र
ज्यों रजनी की ओट चीरकर,
उतरे स्वर्ण-विहान।
बिन भूषण भी दिप-दिप दमके,
तेरी मृदुल मुस्कान।
काजल-भीगी उन आँखों में,
प्रणय का मौन-परवाना।
दीवाना दीवाना, मैं तेरी सादगी का दीवाना।।


बिन लाली अधरों पर फिर भी,
मकरंद से भी मधुर हँसी।
प्रथम प्रभात-किरण-सी निर्मल,
मन में भर दे खुशी।
काँटों मध्य खिला पुष्प ज्यों,
महकाए नेह-तराना।
दीवाना दीवाना, मैं तेरी सादगी का दीवाना।।


वह सरिता-सी शांत सलोनी,
बिन कलरव, बिन शोर।
जिसकी शीतल सुधा बहाकर,
भर दे जीवन-भोर।
जो सजती कम, फिर भी देती,
सौंदर्य-बोध सयाना।
दीवाना दीवाना, मैं तेरी सादगी का दीवाना।।


तेरी सहज सरलता में ही,
छिपा प्रेम-संसार।
जिसके आगे फीके लगते,
वैभव के विस्तार।
तेरा पावन सान्निध्य पाकर,
रोम रोम हुआ मस्ताना।
दीवाना दीवाना, मैं तेरी सादगी का दीवाना।।


सादगी ही सत्य सौंदर्य,
जीवन का श्रृंगार।
जिसके सम्मुख झुक जाता है,
मिथ्या आडंबर-आधार।
तेरी निष्छल छवि ने कर डाला,
मेरा जीवन-पथ सुहाना।
दीवाना दीवाना, मैं तेरी सादगी का दीवाना।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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