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अमरनाथ और माता वैष्णो देवी यात्रा : आस्था, साहस और ईश्वर की कृपा

अमरनाथ और माता वैष्णो देवी यात्रा : आस्था, साहस और ईश्वर की कृपा

  • एक अविस्मरणीय यात्रा-वृत्तांत
लेखक: डॉ. राकेश दत्त मिश्र

सन 2004 की वह यात्रा आज भी मेरी स्मृतियों में अक्षुण्ण है। यह केवल एक तीर्थयात्रा नहीं थी, बल्कि आस्था, साहस, मित्रता और ईश्वर की असीम कृपा का ऐसा अनुभव था जिसने जीवन को नई दृष्टि दी। उस समय जम्मू-कश्मीर आतंकवाद के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था। समाचारों में आए दिन बम विस्फोट, मुठभेड़ और आतंकवादी घटनाओं की खबरें आती थीं, लेकिन इन सबके बीच भगवान भोलेनाथ के पावन धाम अमरनाथ और माँ वैष्णो देवी के दर्शन की तीव्र इच्छा ने हमें यात्रा के लिए प्रेरित किया।

मैं अपने तीन मित्रों-राजेश, मदनमोहन "दीपू" और नंदू-के साथ इस आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़ा।

पटना से यात्रा का शुभारंभ

हम सभी ने पटना जंक्शन से अर्चना एक्सप्रेस पकड़ी। ट्रेन में बैठते ही मन में एक अलग ही उत्साह था। पूरे रास्ते भगवान शिव और माता रानी के भजनों, भविष्य की योजनाओं और यात्रा की कल्पनाओं में समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला।

लगभग डेढ़ दिन की यात्रा के बाद हम जम्मू पहुँचे। तवी नदी के तट पर बसे इस नगर में पहुँचते ही ऐसा लगा मानो हम देवभूमि की दहलीज पर आ गए हों।

माता वैष्णो देवी की पावन यात्रा

जम्मू से हमने वाहन लिया और माता वैष्णो देवी यात्रा के पारंपरिक मार्ग पर आगे बढ़े।

सबसे पहले हम कौल-कंडोली मंदिर पहुँचे। मान्यता है कि बाल्यावस्था में माँ वैष्णो देवी अपनी सखियों के साथ यहाँ खेला करती थीं। हमने श्रद्धापूर्वक माता का आशीर्वाद लिया।

इसके बाद हम देवा माई मंदिर पहुँचे। शांत वातावरण में स्थित यह स्थान आज भी माता की तपस्या और साधना की स्मृतियों को संजोए हुए है।

फिर हमारा अगला पड़ाव था भूमिका (भुमिका) मंदिर, जहाँ यह माना जाता है कि माता ने अपने दिव्य स्वरूप का प्रथम परिचय कराया था।

इन सभी स्थानों के दर्शन के बाद हम कटरा पहुँचे और वहीं से पैदल यात्रा प्रारंभ की।

बाणगंगा से भवन तक

कटरा से आगे बढ़ते हुए सबसे पहले हम बाणगंगा पहुँचे। मान्यता है कि माता ने अपने बाण से यहाँ जलधारा प्रकट की थी। हमने उस पवित्र जल को प्रणाम किया और आगे की चढ़ाई शुरू की।

इसके बाद कठिन चढ़ाई करते हुए हम अर्धकुमारी (गर्भजून) गुफा पहुँचे। यहाँ माता ने नौ माह तक तपस्या की थी। गुफा के दर्शन के बाद मन अत्यंत भावविभोर हो उठा।

लगातार चढ़ाई करते हुए अंततः हम माता के भवन पहुँचे। माँ वैष्णो देवी के दिव्य दर्शन ने सारी थकान पलभर में दूर कर दी। ऐसा लगा जैसे माँ ने स्वयं अपने दरबार में बुलाकर हमारी यात्रा सफल कर दी हो।

दर्शन के बाद हम भैरव घाटी पहुँचे। मान्यता है कि भैरवनाथ के दर्शन किए बिना माता की यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती। वहाँ दर्शन कर हम नीचे की ओर लौट आए।

शिवखोड़ी की अद्भुत गुफा

अगले दिन प्रातः हम शिवखोड़ी के लिए रवाना हुए। प्राकृतिक गुफा के भीतर स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन करना एक अद्भुत अनुभव था। संकरी गुफा, टपकता जल और "हर-हर महादेव" के जयघोष से पूरा वातावरण शिवमय हो उठा।

शिवखोड़ी के दर्शन के बाद हम वापस जम्मू लौट आए। यहीं से हमारी अगली और अधिक कठिन यात्रा-अमरनाथ यात्रा-आरंभ होनी थी।जम्मू से भारतीय सेना की बस द्वारा हमें पहलगाम तक पहुँचाया गया। पूरे मार्ग में सेना की कड़ी सुरक्षा थी। चारों ओर सैनिकों की चौकसी यह एहसास दिला रही थी कि हम एक संवेदनशील क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं।

पहलगाम से आगे की यात्रा पैदल करनी थी। मौसम लगातार खराब था। बादल घिर आए थे, हल्की वर्षा भी हो रही थी और पहाड़ों पर ठंडी हवाएँ चल रही थीं। प्रशासन बार-बार सावधानी बरतने की सलाह दे रहा था।

कई श्रद्धालु घोड़ों और पालकियों का सहारा ले रहे थे, लेकिन हमने चारों मित्रों ने निश्चय किया कि पूरी यात्रा पैदल ही करेंगे। हमारा विश्वास था कि बाबा बर्फानी तक पहुँचने का आनंद तभी पूर्ण होगा जब प्रत्येक कदम अपनी श्रद्धा और परिश्रम से आगे बढ़े।
कठिन चढ़ाई और साथियों का निर्णय

यात्रा प्रारंभ हुए अधिक समय नहीं बीता था कि कठिन चढ़ाई ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया।

सबसे पहले हमारे मित्र नंदू ने घोड़े की सवारी करने का निर्णय लिया। कुछ दूरी तक पैदल चलने के बाद उन्होंने कहा—

"अब मुझसे आगे पैदल नहीं चला जाएगा।"

हमने उनका निर्णय स्वीकार किया और वे घोड़े पर बैठकर आगे बढ़ गए।

इसके बाद जब हम गणेश टॉप की ओर बढ़ रहे थे, तब लगातार चढ़ाई और कठिन मार्ग ने राजेश को भी थका दिया। अंततः उन्होंने भी घोड़े की सवारी ले ली।

अब केवल मैं और मेरे मित्र मदनमोहन "दीपू" ही पैदल यात्रा कर रहे थे।

हम दोनों एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाते हुए "हर-हर महादेव" और "बम-बम भोले" के जयघोष के साथ आगे बढ़ते रहे। पहाड़ों की ऊँचाई, बर्फीली हवाएँ, संकरे रास्ते और हजारों श्रद्धालुओं का उत्साह—सब मिलकर इस यात्रा को अलौकिक बना रहे थे।
शेषनाग में भूख और भय

शाम होते-होते हम शेषनाग पहुँचे।

दिनभर की कठिन यात्रा के बाद शरीर थक चुका था और भूख भी तेज लगी थी। हमें जानकारी मिली कि निकट के एक लंगर में भोजन मिल रहा है। हम प्रसन्न होकर वहाँ पहुँचे।

लेकिन वहाँ पहुँचते ही जो समाचार मिला, उसने हमारे पैरों तले जमीन खिसका दी।

लंगर संचालकों ने बताया—

"आज भोजन नहीं मिलेगा। आतंकवादियों ने लंगर में बम विस्फोट कर दिया है।"

कुछ ही क्षण पहले तक जहाँ श्रद्धालुओं के लिए भोजन बन रहा था, वहाँ अब भय और अफरा-तफरी का वातावरण था।

उस समय पहली बार हमें एहसास हुआ कि हम वास्तव में कितने खतरनाक क्षेत्र में हैं।

भूख लगी थी, शरीर थका था, लेकिन उससे कहीं अधिक मन विचलित था।

उस रात हमने बिना भोजन के ही भगवान शिव का स्मरण करते हुए समय बिताया।
प्रभात की नई ऊर्जा

सुबह जब सूरज की पहली किरण पहाड़ों पर पड़ी, तो ऐसा लगा जैसे स्वयं भगवान ने हमें नई शक्ति प्रदान कर दी हो।

हमने पास के बर्फीले झरने में स्नान किया।

उस जल की ठंडक शरीर को कंपा रही थी, लेकिन मन में अद्भुत उत्साह था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि बाबा बर्फानी स्वयं हमें अपने दर्शन के लिए बुला रहे हैं।
बाबा बर्फानी के दिव्य दर्शन

कुछ ही समय बाद हम अमरनाथ की पवित्र गुफा के निकट पहुँच गए।

आज भी वह दृश्य मेरी आँखों के सामने सजीव है।

जिस गुफा में सामान्यतः हजारों श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहती थीं, वहाँ उस समय केवल लगभग दस श्रद्धालु ही उपस्थित थे।

पूरा वातावरण शांत था।

ऐसा लग रहा था मानो स्वयं भगवान शिव ने हमें एकांत में अपने दर्शन का अवसर दिया हो।

हमने श्रद्धापूर्वक बाबा बर्फानी के हिमलिंग के दर्शन किए।

उस क्षण मन में कोई इच्छा नहीं थी, कोई मांग नहीं थी—केवल कृतज्ञता थी।

आज भी जब उस दृश्य को स्मरण करता हूँ तो रोम-रोम पुलकित हो उठता है।
बालटाल से वापसी

दर्शन के बाद हमने वापसी के लिए बालटाल मार्ग चुना।

यह मार्ग अपेक्षाकृत छोटा तो था, लेकिन अधिक कठिन और खतरनाक माना जाता है।

किसी प्रकार हम नीचे उतरकर कश्मीर पहुँचे।

हमें लगा कि अब यात्रा का सबसे कठिन भाग समाप्त हो चुका है।

लेकिन नियति ने शायद अभी हमारी परीक्षा पूरी नहीं की थी।
लाल चौक का बम विस्फोट

जब हम श्रीनगर पहुँचे, तब वहाँ के प्रसिद्ध लाल चौक क्षेत्र में अचानक बम विस्फोट हो गया।

चारों ओर भगदड़ मच गई।

लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे।

कुछ ही क्षणों में पूरा वातावरण चीख-पुकार और अफरा-तफरी से भर गया।

हम चारों मित्र भी किसी प्रकार स्वयं को सुरक्षित रखते हुए वहाँ से निकले और पास के एक होटल में शरण ली।

उस रात शायद ही किसी की आँखों में नींद आई हो।

हर छोटी-सी आवाज़ हमें चौंका देती थी।

हम केवल भगवान का नाम जपते रहे और प्रार्थना करते रहे कि सुबह सकुशल हो जाए।
सुरक्षित वापसी

अगले दिन भारतीय सेना की सहायता से हमें जम्मू लौटने का अवसर मिला।

जैसे ही सेना की गाड़ी जम्मू पहुँची, ऐसा लगा मानो जीवन फिर से लौट आया हो।

हम सबने एक-दूसरे की ओर देखा।

चेहरों पर थकान थी, लेकिन उससे कहीं अधिक संतोष था।

हम सकुशल लौट आए थे।
इस यात्रा ने क्या सिखाया?

यह यात्रा केवल अमरनाथ और माता वैष्णो देवी के दर्शन भर नहीं थी।

इसने हमें सिखाया-

· आस्था भय से बड़ी होती है।

· कठिन परिस्थितियों में धैर्य ही सबसे बड़ा साथी होता है।

· जीवन का प्रत्येक क्षण ईश्वर का दिया हुआ अमूल्य उपहार है।

· भारतीय सेना के त्याग और समर्पण के कारण ही लाखों श्रद्धालु कठिन परिस्थितियों में भी सुरक्षित यात्रा कर पाते हैं।

· जब मन में सच्ची श्रद्धा हो, तब भगवान अपने भक्तों का मार्ग स्वयं प्रशस्त करते हैं।
आज भी याद है...

दो दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन आज भी जब "बम-बम भोले" का उद्घोष सुनाई देता है, तो शेषनाग की वह ठंडी रात, बर्फीला झरना, बाबा बर्फानी के शांत दर्शन, लाल चौक का विस्फोट और सेना की सुरक्षा में जम्मू लौटने का वह क्षण आँखों के सामने चलचित्र की भाँति घूम जाता है।

उस यात्रा ने हमें यह विश्वास दिया कि जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएँ, यदि मन में श्रद्धा, साहस और ईश्वर पर अटूट विश्वास हो, तो हर संकट का मार्ग निकल ही आता है।

हर-हर महादेव!
जय बाबा बर्फानी!
जय माता दी!


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