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देवता भी तरसते हैं, शहीद का गौरव पाने को

देवता भी तरसते हैं, शहीद का गौरव पाने को

कुमार महेंद्र
अमर विदा की बेला में,
जो राष्ट्र-यज्ञ में होम हुए।
माटी की लाज बचाने को,
जो हँसते-हँसते मौन हुए।
वह रक्त नहीं, पावन चंदन है,
जो बहा राष्ट्र-धर्म निभाने को।
देवता भी तरसते हैं, शहीद का गौरव पाने को।।

सिंहासन डोले अंबर के,
जब वीर तिरंगे में सोता है।
इतिहास स्वर्णिम अक्षरों में,
उसका ही यश-गान पिरोता है।
वह दीप नहीं, ध्रुवतारा है,
घट-घट आलोक फैलाने को।
देवता भी तरसते हैं, शहीद का गौरव पाने को।।

अमृत का घट भी फीका है,
उस माँ के आँसू के आगे।
जो वीर सपूतों को जन्म दे,
जिससे राष्ट्र-भाग्य जागे।
स्वर्ग स्वयं व्याकुल रहता,
उन चरणों में शीश झुकाने को।
देवता भी तरसते हैं, शहीद का गौरव पाने को।।

तप भी तुच्छ प्रतीत होता,
जो मान यहाँ वे पाते हैं।
सुरलोक छोड़ स्वयं देवगण,
धरती पर शीश नवाते हैं।
सचमुच इस अनुपम गौरव को,
देव सदा आतुर अपनाने को।
देवता भी तरसते हैं, शहीद का गौरव पाने को।।

नश्वर तन मिट जाता लेकिन,
अमर कहानी रह जाती है।
बलिदानों की पावन गाथा,
जन-जन को पथ दिखलाती है।
भारत-माता की जय-ध्वनि गूंजे,
युगों-युगों तक राह दिखाने को।
देवता भी तरसते हैं, शहीद का गौरव पाने को।।

कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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