स्मृतियों के झरोखे से झांकता बिहटा'
लेखक: सत्येन्द्र कुमार पाठक
समय का पहिया कितनी तेजी से घूमता है, इसका अहसास तब होता है जब हम किसी ऐसी भूमि पर खड़े होते हैं जिसने सदियों का इतिहास अपनी छाती में समेट रखा है। मेरे लिए बिहटा केवल मानचित्र पर अंकित एक नाम या पटना जिले का एक उभरता हुआ उपनगर मात्र नहीं है; यह मेरे जीवन के वैचारिक विमर्शों, मेरी ऐतिहासिक खोजों और मगध की विरासत को समझने की मेरी अनवरत यात्रा का एक अत्यंत जीवंत पड़ाव है।
जब मैं आज के आधुनिक बिहटा को देखता हूँ—जहाँ कंक्रीट की गगनचुंबी इमारतें बन रही हैं, जहाँ देश-विदेश के छात्र भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) पटना के परिसरों में भविष्य का अनुसंधान कर रहे हैं, और जहाँ प्रिंसटन मगध ड्राई पोर्ट पर इंडोनेशिया से सीधे कच्चा माल लेकर 45 रैक वाली मालगाड़ियाँ पहुँच रही हैं—तो मेरा मन बरबस ही अतीत के उन पन्नों को पलटने लगता है, जिन्हें मैंने अपनी लेखनी और शोध के माध्यम से वर्षों तक जिया है। दानापुर अनुमंडल और पाटलिपुत्र लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र (मनेर विधानसभा) के अंतर्गत आने वाले इस 'ग्रेटर पटना' के पास सुनाने के लिए अपनी एक ऐसी अनूठी गाथा है, जिसमें ऋषि संस्कृति से लेकर आधुनिक औद्योगिक क्रांति तक के सुर समाहित हैं।
जब मैंने मगध के सांस्कृतिक और पुरातात्विक इतिहास पर काम करना शुरू किया था, तब बिहटा के नामकरण ने मुझे बहुत आकर्षित किया। लोक-मानस और भाषाविदों के बीच इसे लेकर दो सुंदर दृष्टिकोण रहे हैं।
बिटेश्वरनाथ से बिहटा: स्थानीय मान्यताओं और प्राचीन दस्तावेज़ों के अनुसार, यहाँ स्थापित अत्यंत प्राचीन 'बिटेश्वरनाथ शिवलिंग' (जिन्हें वर्तमान में बिहटेश्वरनाथ भी कहा जाता है) के कारण इस क्षेत्र को पूर्व में 'विटाहट्ट' या 'बिटेश्वर' कहा जाता था। यही नाम सदियों के भाषाई अपभ्रंश से गुजरता हुआ अंततः 'बिहटा' के रूप में स्थापित हो गया। भौगोलिक स्वरूप: हिंदी , मगही और भोजपुरी लोकभाषा में 'भीठा' या 'बीटा' का तात्पर्य एक ऊंचे टीले या बाढ़ से सुरक्षित ऊंचे स्थान से होता है। सोन और गंगा जैसी प्रतापी नदियों के मैदानी इलाकों के बीच स्थित यह ऊँचा भूभाग स्वाभाविक रूप से प्राचीन काल में मानव बसावट के लिए सबसे सुरक्षित था, इसलिए भी यह बिहटा कहलाया।
एक इतिहासकार के रूप में, बिहटा की मिट्टी को छूकर मुझे हमेशा एक अजीब सी सिहरन महसूस होती है। यह वह भूमि है जिसने भारत के विशाल साम्राज्यों को बनते, बढ़ते और इतिहास के पन्नों में विलीन होते देखा है
वैदिक काल (ऋषि संस्कृति) ➔ मौर्य-गुप्त काल (सामरिक केंद्र) ➔ पाल-सेन काल (धार्मिक पुनरुत्थान) ➔ मुगल-ब्रिटिश काल (व्यापार व सैन्य बेस) ➔ आधुनिक काल (बिहटा ) है।
मौर्य और गुप्त साम्राज्य की सामरिक धुरी चूंकि बिहटा मौर्य साम्राज्य की महान राजधानी पाटलिपुत्र के बेहद निकट (महज 30 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम) स्थित था, इसलिए इसका रणनीतिक महत्व असाधारण था। सोन नदी के जलमार्ग के समीप होने के कारण मौर्य और गुप्त काल में यह एक प्रमुख सैन्य छावनी और रसद आपूर्ति का केंद्र हुआ करता था। सम्राट चंद्रगुप्त और अशोक के काल में इस मार्ग से होकर मगध की सेनाएं दक्षिण और पश्चिम की ओर है।
8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच जब मगध की धरती पर पाल वंश का शासन था, तब बिहटा और इसके ग्रामीण अंचलों में बौद्ध और तांत्रिक संस्कृति का गहरा प्रभाव पड़ा। इसके बाद सेन राजाओं के समय यहाँ सनातन और शैव परंपराओं का पुनरुत्थान हुआ। इसी कालखंड में बिहटेश्वर मंदिर को एक नई धार्मिक पहचान और भव्यता मिली। शेरशाह सूरी और मुगलों के काल में बिहटा एक बड़े राजस्व और अनाज व्यापार के केंद्र के रूप में उभरा। इसके उपजाऊ मैदानी इलाकों ने इसे दिल्ली सल्तनत और मुगलों के लिए एक महत्वपूर्ण परगना बना दिया। इसी दौर में यहाँ के विभिन्न गाँवों का प्रशासनिक नामकरण शुरू हुआ।
ब्रिटिश काल का टर्निंग पॉइंट और सामरिक सैन्य हवाई अड्डा - बिहटा के आधुनिक इतिहास में सबसे बड़ा मोड़ ब्रिटिश शासनकाल में आया। अंग्रेजों ने इसकी भौगोलिक स्थिति को भांपते हुए इसे एक महत्वपूर्ण सैन्य केंद्र के रूप में तब्दील करने का निर्णय लिया। द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के काले बादलों के बीच, बिहटा का सैन्य एयरफील्ड वैश्विक युद्ध का एक प्रमुख गवाह बना। इस एयरफील्ड का उपयोग ब्रिटिश सेना द्वारा अमेरिकी निर्मित 'वैको हैड्रियन' (Waco Hadrian) कॉम्बैट ग्लाइडर्स को असेंबल करने और उनके परीक्षण के लिए एक रणनीतिक बेस के रूप में किया जाता था। मुझे याद है, जब मैं पुराना सैन्य इतिहास खंगाल रहा था, तब यह जानकर अचरज हुआ था कि मगध के इस शांत कोने में कभी विश्व युद्ध के लड़ाकू विमानों की गड़गड़ाहट गूंजती थी।
भारतीय वायु सेना का आगमन - स्वतंत्रता के पश्चात, इस सामरिक धरोहर के महत्व को समझते हुए, वर्ष 1964 में भारतीय वायु सेना की 'नंबर 6 केयर एंड मेंटेनेंस यूनिट' (6 CMU) की स्थापना यहाँ की गई। आज यही एयरफील्ड एक नए अवतार में हमारे सामने आ रहा है। पटना के हवाई अड्डे के नागरिक दबाव को कम करने के लिए इसे एक अंतरराष्ट्रीय सिविल एन्क्लेव (नागरिक हवाई अड्डे) के रूप में विकसित किया जा रहा है, जो बिहटा को सीधे दुनिया से जोड़ेगा।
आध्यात्मिक चेतना के दो स्तंभ: बिहटेश्वर शिवलिंग और मां वनदेवी - बिहटा का भौतिक विकास अपनी जगह है, लेकिन इसकी आत्मा यहाँ के प्राचीन मंदिरों और आध्यात्मिक विश्वासों में बसती है। मेरे लेखन में हमेशा संस्कृति और लोक-आस्था को प्राथमिकता मिली है, और बिहटा इस मामले में बेहद धनी है। बिहटेश्वर नाथ महादेव शहर के मुख्य केंद्र में स्थित यह शिवालय बिहटा की शैव संस्कृति का आदि-प्रतीक है। स्थानीय लोक-कथाओं के अनुसार, इस शिवलिंग की स्थापना महाभारत काल में इस क्षेत्र से गुजरने वाले ऋषि-मुनियों द्वारा की गई थी। यहाँ की महाशिवरात्रि और सावन के महीने में उमड़ने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि सदियों बाद भी यहाँ की सांस्कृतिक निरंतरता टूटी नही
बिहटा रेलवे स्टेशन से लगभग 4 किलोमीटर दक्षिण में, अमहरा और खगरपुर गाँवों के शांत आंचल में सवनदेवी मंदिर के प्रति मेरी गहरी व्यक्तिगत श्रद्धा है। "आदिकाल से भारत धर्म प्रधान देश रहा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर लगभग 400 साल पुराना है, जो मुगलकाल के उत्तरार्ध का समय रहा होगा। जब यह पूरा इलाका घने जंगलों से आच्छादित था, तब यहाँ माँ की पिंडी प्राकृतिक रूप से प्रकट हुई थी। इन्हें विंध्याचल माता का साक्षात अंश माना जाता है। लोक-आस्था है कि मात्र सच्चे मन से दर्शन करने से भक्तों के सभी कष्टों का निवारण हो जाता है।"
अमहरा और खगरपुर की हरी-भरी वादियों के बीच स्थित यह मंदिर शाक्त संस्कृति (शक्ति पूजा) का एक अनुपम केंद्र है। बिहटा का इतिहास संकीर्ण नहीं, बल्कि अत्यंत उदार रहा है। यहाँ कई धार्मिक धाराओं का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है: ऋषि, सौर और ब्रह्म संस्कृति: वैदिक काल में सोनभद्र (सोन नदी) का यह तटीय इलाका कई महर्षियों की तपोभूमि रहा। यहाँ सूर्य देव की आराधना (सौर संस्कृति) के प्राचीन प्रमाण और छठ पूजा की महान परंपरा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। वैष्णव संस्कृति: बिहटा के पुराने गाँवों की प्राचीन ठाकुरबाड़ियों में गूंजने वाले कीर्तन और राम-कृष्ण की भक्ति यहाँ की वैष्णव जड़ों को दर्शाती है। बौद्ध और जैन संस्कृति का अवदान: वैशाली, नालंदा और पाटलिपुत्र के त्रिकोण के बीच स्थित होने के कारण, महात्मा बुद्ध और भगवान महावीर के वैचारिक संदेशों की गूंज इस मिट्टी में समाहित है। समय-समय पर यहाँ के पुराने टीलों की खुदाई से मिलने वाले पुरातात्विक अवशेष और मूर्तियां इसके बौद्ध और जैन अतीत को प्रमाणित करते हैं ।
बिहटा केवल एक बाज़ार या नगर नहीं है, बल्कि यह अपने आस-पास फैले कई ऐतिहासिक और समृद्ध गाँवों के सह-अस्तित्व से बना है। इन गाँवों का अपना एक विशिष्ट इतिहास और समाजशास्त्र रहा है: पैनाल, अमहरा और कन्हौली गाँव पाल और सेन काल की बसावटों के प्रतीक हैं। कन्हौली का नाम कान्हा (श्री कृष्ण) के सांस्कृतिक प्रभाव को दर्शाता है, जो आज कन्हौली बस टर्मिनस और एलिवेटेड रोड के कारण न्यू पटना का मुख्य द्वार बन रहा है। अमहरा आज चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में 'नेताजी सुभाष मेडिकल कॉलेज' के कारण पूरे राज्य में ख्याति प्राप्त कर रहा है। पैनाल कला, साहित्य और कृषि चेतना का एक पुराना गढ़ रहा है, जहाँ आज भी साहित्यिक गोष्ठियों और प्रांतीय अधिवेशनों की समृद्ध परंपरा जीवित है।।ये गाँव मध्यकाल और मुगल शासन के दौरान प्रशासनिक सुधारों और ज़मींदारी व्यवस्था के तहत वजूद में आए। सिकंदरपुर का नाम दिल्ली सल्तनत के सुल्तान सिकंदर लोधी के प्रभाव काल की याद दिलाता है, जबकि राघोपुर और आनंदपुर राजपूत और भूमियार ज़मींदारों के शौर्य, गढ़ी (किले) और कृषि विस्तार की कहानियों को बयां करते हैं।
बिहटा की आर्थिक यात्रा दो बड़े मील के पत्थरों के बीच झूलती है—एक बीता हुआ कल और एक स्वर्णिम आज
ब्रिटिश काल में वर्ष 1930-1940 के दशक (लगभग 1938) में स्थापित बिहटा चीनी मिल इस क्षेत्र का आर्थिक हृदय हुआ करती थी। 1970 का दशक इस मिल का स्वर्ण काल था। जब मिल की चिमनियों से धुआँ निकलता था, तो पूरे बिहटा और भोजपुर के गन्ना किसानों के घरों में समृद्धि की मिठास घुल जाती थी। यद्यपि बाद के दशकों में यह मिल बंद हो गई, लेकिन इसने बिहटा को एक औद्योगिक कस्बा बनाने की नींव रख दी थी।
आज बिहटा ने अपनी उस बंद चीनी मिल के अवसाद को पीछे छोड़कर वैश्विक व्यापार की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। बिहार के औद्योगिक इतिहास में एक अभूतपूर्व स्वर्णिम अध्याय तब जुड़ा, जब इंडोनेशिया से सीधे कच्चा माल लेकर 45 रैक वाली विशाल मालगाड़ी बिहटा ड्राई पोर्ट पहुँची। यह घटना इस बात की गवाह है कि बिहटा अब केवल बिहार का एक शहर नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स और व्यापार का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है।
जब मैं बिहटा के बौद्धिक और राजनीतिक इतिहास पर विचार करता हूँ, तो मेरा मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है। यह वह भूमि है जिसने भारत के किसान आंदोलन को उसकी सबसे प्रखर आवाज़ दी। क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी और किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती ने बिहटा के 'श्री सीताराम आश्रम' को अपने देशव्यापी किसान आंदोलन का मुख्यालय बनाया था। यह आश्रम केवल साधुओं के रहने की जगह नहीं थी, बल्कि यह शोषित किसानों की मुक्ति का वैचारिक कारखाना था। इसी आश्रम में बैठकर स्वामी जी ने 'हुंकार' जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया और अपनी ओजस्वी लेखनी से ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का स्वामी जी से मिलने बिहटा आना इस बात का प्रमाण है कि आजादी की लड़ाई में बिहटा राष्ट्रीय राजनीति का एक केंद्र बिंदु था।।1942 के आंदोलन में बिहटा के स्थानीय युवाओं और स्वतंत्रता सेनानियों ने अदम्य साहस का परिचय दिया था। यहाँ के रेलवे स्टेशन और ब्रिटिश प्रशासनिक भवनों पर तिरंगा फहराने के प्रयास में स्थानीय जनता ने अंग्रेजी दमन का डटकर मुकाबला किया था।
बिहटा की गलियों से लेकर इसके आधुनिक फ्लाईओवरों तक का यह सफर मेरे लिए एक सांस्कृतिक और व्यक्तिगत अनुभव रहा है। बिहटा आज अपनी प्राचीन विरासत, जैसे कि 400 साल पुराना वनदेवी मंदिर और महाभारत कालीन बिहटेश्वरनाथ शिवलिंग, को सहेजे हुए आधुनिकता की नई इबारत लिख रहा है।IIT पटना के युवा वैज्ञानिक, कन्हौली के नए बस टर्मिनस पर उमड़ती भीड़, और ड्राई पोर्ट पर गूंजती मालगाड़ियों की सीटी—ये सब मिलकर एक नए, आत्मनिर्भर और प्रगतिशील बिहार का शंखनाद कर रहे हैं। बिहटा का यह संस्मरण केवल अतीत का रोना नहीं है, बल्कि यह इस बात का उत्सव है कि कैसे एक ऐतिहासिक उपनगर ने अपनी अस्मिता को खोए बिना खुद को 21वीं सदी के महानगरीय ढांचे में ढाल लिया है।।मेरी लेखनी और मेरा शोध हमेशा इस माटी का ऋणी रहेगा, जिसने मुझे मगध की विरासत को इतने करीब से देखने, समझने और जीने का अवसर दिया। बिहटा बदल रहा है, बढ़ रहा है, और अपनी प्राचीन चेतना के साथ 'न्यू पटना' बनकर क्षितिज पर चमक रहा है।हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

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