साहित्य के उज्ज्वल नक्षत्र : नृपेन्द्रनाथ गुप्त
- दुर्गेश मोहन
हिन्दी साहित्य के विशाल आकाश में अनेक ऐसे नक्षत्र हुए हैं जिन्होंने अपने ज्ञान, सृजन और समर्पण से साहित्य-जगत को आलोकित किया। ऐसे ही एक दैदीप्यमान साहित्यिक व्यक्तित्व थे नृपेन्द्रनाथ गुप्त, जिन्होंने साहित्य, भाषा, समाज और संस्कृति की सेवा को अपने जीवन का ध्येय बनाया। उनका साहित्यिक अवदान हिन्दी जगत में सदैव स्मरणीय रहेगा।
नृपेन्द्रनाथ गुप्त का जन्म 1 सितम्बर 1934 को बिहार के मुंगेर जिले के माधोपुर ग्राम में हुआ था। उनके पिता श्री उदित नारायण लाल एवं माता श्रीमती मैना देवी थीं। बाल्यावस्था में ही मातृ-वियोग का दुःख झेलने वाले गुप्त जी ने संघर्ष, आत्मविश्वास और परिश्रम के बल पर जीवन में विशिष्ट स्थान प्राप्त किया। पिता के स्नेह, अनुशासन और प्रेरणा ने उन्हें एक सफल साहित्यकार और समाजसेवी बनने की दिशा प्रदान की।
उनकी प्रारम्भिक शिक्षा मुंगेर के नगरपालिका विद्यालय में हुई। इसके पश्चात उन्होंने टाउन स्कूल, मुंगेर से माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की तथा आर.डी. एंड डी.जे. कॉलेज, मुंगेर से उच्च शिक्षा ग्रहण की। आगे चलकर उन्होंने 1959 में पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। छात्र जीवन से ही उनकी रुचि साहित्य, पठन-पाठन और लेखन में रही। महान कथाकार प्रेमचंद की यथार्थवादी रचनाओं ने उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया।
विद्यालयी जीवन में उन्होंने हस्तलिखित पत्रिका ‘बालसेवा दल’ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। साहित्य और समाज के प्रति उनके समर्पण का परिणाम था कि 15 अगस्त 1958 को उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मुंगेर में बालसेवा-दल पुस्तकालय की स्थापना की। यह पुस्तकालय शीघ्र ही साहित्यिक और सामाजिक चेतना का केन्द्र बन गया। उनके इस प्रयास की सराहना बिहार के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह तथा जनकवि नागार्जुन जैसे महान व्यक्तित्वों ने भी की।
गुप्त जी का साहित्यिक परिचय बाल साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘बाल-बोध’ से हुआ, जो इलाहाबाद से प्रकाशित होती थी। उनकी प्रतिभा और लेखन-कौशल के कारण उन्हें छात्र जीवन में ही राष्ट्रीय स्तर की इस पत्रिका के सम्पादक मंडल में स्थान मिला। आगे चलकर पटना विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान प्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य नलिन विलोचन शर्मा के सान्निध्य ने उनके साहित्यिक जीवन को नई दिशा प्रदान की। यहीं से वे गंभीर साहित्य-सृजन की ओर अग्रसर हुए।
नृपेन्द्रनाथ गुप्त का साहित्य बहुआयामी था। उनका प्रथम काव्य-संग्रह ‘आत्मबोध’ वर्ष 1965 में प्रकाशित हुआ, जिसमें पच्चीस कविताएँ संकलित थीं। इस संग्रह ने उन्हें साहित्य-जगत में विशिष्ट पहचान दिलाई। उनकी कविताओं में राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनाएँ तथा प्रकृति के प्रति अनुराग का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। वे केवल कवि ही नहीं, बल्कि एक सजग चिंतक और समाज-द्रष्टा भी थे।
उनकी प्रमुख कृतियों में ‘आत्मबोध’ तथा ‘समय का सच’ उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने तीन महत्वपूर्ण निबंध-संग्रह भी लिखे—
अंग्रेजी बनाम हिन्दी
बंगला एवं हिन्दी
विश्व भाषा हिन्दी : भारत में उपेक्षित
इन कृतियों में हिन्दी भाषा की स्थिति, उसकी चुनौतियों और उसकी वैश्विक संभावनाओं पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया गया है। हिन्दी के प्रति उनका समर्पण आज भी प्रेरणास्पद है।
उनकी पुस्तक ‘आत्मबोध’ को हिन्दी जगत के अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों की प्रशंसा प्राप्त हुई। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने इसकी सराहना करते हुए लिखा—
"आपकी ‘आत्मबोध’ पुस्तिका मिली। कविताएँ नए ढंग की हैं और सुबोध हैं, इसलिए वे मुझे पसंद आयीं। लिखते चलिए।"
वहीं प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन ने भी पुस्तक प्राप्ति पर उन्हें धन्यवाद देते हुए उनके साहित्यिक प्रयासों की सराहना की।
गुप्त जी का साहित्यिक जीवन अनेक महान साहित्यकारों के स्नेह और मार्गदर्शन से समृद्ध हुआ। उन्हें राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, जनकवि नागार्जुन, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, गोपाल सिंह नेपाली, राहुल सांकृत्यायन, उपेन्द्रनाथ अश्क तथा लक्ष्मी नारायण ‘सुधांशु’ जैसे विद्वानों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। इन साहित्यकारों के साथ उनके आत्मीय संबंध उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा का प्रमाण हैं।
साहित्य के साथ-साथ वे सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी अत्यंत सक्रिय रहे। उन्होंने विभिन्न संस्थाओं में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। वे राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार के पूर्व उपाध्यक्ष, सांस्कृतिक युवा मंच के संस्थापक अध्यक्ष, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थायी समिति के वरीय उपाध्यक्ष तथा अनेक साहित्यिक-सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी रहे। भू-राजस्व विभाग में रजिस्ट्रार जैसे महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए भी उन्होंने साहित्य और समाज सेवा का कार्य निरंतर जारी रखा। वे त्रैमासिक पत्रिका ‘नया भाषा भारती संवाद’ के प्रधान सम्पादक भी रहे।
नृपेन्द्रनाथ गुप्त केवल साहित्यकार ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत व्यक्तित्व भी थे। वे स्वतंत्रता आंदोलन की विचारधारा से प्रभावित रहे और समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों के प्रति विशेष आकर्षण रखते थे। सामाजिक न्याय, भाषा सम्मान और राष्ट्रीय एकता के प्रश्न उनके चिंतन के केन्द्र में रहे।
उनके साहित्यिक एवं सामाजिक योगदान के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत किया गया। विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ द्वारा प्रदत्त ‘विद्यासागर (डी.लिट्.)’ उपाधि, ‘इंटरनेशनल मैन ऑफ द ईयर’ सम्मान, वीर नूनू प्रसाद सिंह साहित्यिक पुरस्कार तथा अनेक संस्थाओं द्वारा प्रदान किए गए अभिनंदन पत्र और सम्मान उनके व्यक्तित्व की गरिमा को प्रमाणित करते हैं।
12 जून 2022 को पटना के एक निजी अस्पताल में उनका निधन हो गया। उनके ज्येष्ठ पुत्र आलोक कुमार गुप्त ने पटना के गुलबी घाट पर उन्हें मुखाग्नि दी। अपने पीछे वे एक सुसंस्कृत एवं समृद्ध परिवार छोड़ गए। उनके निधन से हिन्दी साहित्य जगत में जो रिक्तता उत्पन्न हुई, उसकी पूर्ति सहज संभव नहीं है।
आज भले ही नृपेन्द्रनाथ गुप्त हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, किन्तु उनकी रचनाएँ, विचार और साहित्यिक साधना उन्हें अमर बनाए हुए हैं। हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। साहित्य-साधना के माध्यम से उन्होंने जो प्रकाश फैलाया, वह सदैव हिन्दी जगत को आलोकित करता रहेगा।
श्रद्धांजलि
गुप्त जी का साहित्यिक अवदान,
यह है एक अद्भुत पहचान।
सारे संसार में है गुंजायमान,
हिन्दी पल्लवित-पुष्पित होकर बनी महान।यह आलेख स्मारिका, श्रद्धांजलि ग्रंथ, साहित्यिक पत्रिका अथवा पुण्यतिथि विशेषांक के लिए उपयुक्त है।
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