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ज्येष्ठ मास महात्मय {तीसवां अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {तीसवां अध्याय}

लेखक: आनन्द हठीला
सूतजी बोले कि हे ऋषिलोग ! आप सब लोग श्रवण करें, जो फल माहात्म्य श्रवण से मिलता है वह सौ यज्ञ करने पर भी नहीं मिल सकता ॥ १ ॥

समस्त दान देने से, समस्त तीर्थों में स्नान करने से और जपयज्ञ से जो फल मिलता है, वह फल माहात्म्य श्रवण से मिलता है ।॥ २ ॥

सम्पूर्ण माहात्म्य श्रवण करने से मनुष्य पुनजन्म का मागी नहीं होता । सम्पूर्ण, अथवा आधा, अथवा आधा का आधा, अथवा चतुर्थांश का आधा ॥ ३ ॥


अथवा एक अध्याय, आधा अध्याय, एक श्लोक, आधा श्लोक जो भक्ति श्रद्धा से श्रवण करता है उसको अनन्त पुण्य होता है ॥ ४ ॥


हे द्विजलोग ! स्वन्प पुण्यवान् पुरुपों के पुण्यकार्य मे अनेको विघ्न होते है, इस लिये विघ्नशान्ति के निमित्त मनुष्य को पुण्य करना चाहिये ॥ ५ ॥


यदि स्नान कर्म और माहात्म्य श्रवण कर्म में विघ्न आ जाय तो उस विघ्नभय से पुण्य का त्याग न करे, उस कर्म को दूसरे से करा देवे ॥ ६ ॥


पुनः पुनः पुण्यकर्म करने से विघ्नों का नाश हो जाता है। कलि में करने के योग्य बहुत से कर्म कहे है ॥ ७ ॥


कलियुग के समय उन सभों में पुराणश्रवण श्रेष्ठ कहा है। गोहत्यारा, स्त्रीहत्यारा, कृतघ्न, ब्राह्मण हत्यारा, पितृघाती ॥ ८ ॥


मातृवध कर्ता, मद्यपी, कुष्ठी, चोर, विश्वासघाती ये सब कलियुग मे पुराणश्रवण करने से पापमुक्त हो जाते है ॥९॥


पुराण का श्रवण बालक वृद्ध आतुर निष्काम सकाम उत्तम मध्यम अधम सभी को करना चाहिये ॥ १० ॥


स्त्री शूद्र पतित भी पुराण का श्रवण करे, पुराणश्रवण से तचत् सभी इष्ट फल को पाता है ॥ ११ ॥


अकाम (निष्काम ) सकाम, आस्था, अनास्था, स्पर्धा, कपट, निस्पृह, सस्पृह सभी लोग ॥ १२ ॥


पुराण श्रवण से स्वमनोरथ को पाते हैं। भक्तिहीन होकर भी पातकी इस माहात्म्य का श्रवण कर स्वर्ग को गया ॥ १३ ॥


इस विषय में मैं पापनाशिनी कथा को कहूँगा। प्रथम द्वारका पुरी में देवशर्मा नामक ब्राह्मणाधम रहता था ॥ १४ ॥


ब्रह्मकर्म से भ्रष्ट वह ब्राह्मण सर्वदा प्रेतकर्म करता था और सर्वदा दुष्टकर्म करता था ॥ १५ ॥


परन्तु फिर भी कुटुम्ब के निर्वाह के निमित्त चोरी का काम सुरू किया । इस तरह उस रमणीय नगर में बहुत वर्ष बीत गये ॥ १६ ॥


तदनन्तर दैवयोग से ज्येष्ठ का महीना आया, ज्येष्ठ मास में सभो नागरिक ज्येष्ठस्नान करने को उद्यत हुये ॥ १७ ॥


और बलि (दानवस्तु) पूजा सामान को लेकर प्रतिदिन गोमती में स्नान के निमित्त जाते थे, तथा वहां जाकर स्नानोत्तर वस्त्र धारण कर विष्णुमन्दिर में जाते थे ॥ १८ ॥


तदनन्तर सभी एकत्रित होकर ब्राह्मणश्रेष्ठ को व्यासासन देकर यथाशक्ति वस्त्र अलङ्कार आदि से पूजाकर ।॥ १९ ॥


उस व्यास से आदर पूर्वक ज्येष्ठमास का माहात्म्य श्रवण करते थे। इस तरह दो प्रहर वहां रहकर अपने गृह को आते थे ॥ २० ॥


कतिपय दिन बीतने पर वह द्विजाधम चोरी के निमित्त उद्यत चोरी करने निरन्तर जाया करता था ॥२१॥


और कहां से क्या चोरी करें इस चिन्ता मे उसे वहां तालाब पर बहुत 'दिन बीत गया परन्तु उसे चोरी करने का मोका न मिला ॥२२॥


आज कन्ह मे वस्त्र आभूषण की चोरी करूँगा इसी विचार में सभ समय बीत गया और पूर्णिमा तिथि आ गई ॥ २३ ॥


उस दिन सभी लोगों ने 'उत्साह- पूर्वक स्नानादि क्रिया करके पुराण का श्रावण किंया और व्यास का पूजन ॥ २४ ॥


वस्त्र आभूषण द्रव्य फल फूल ताम्बूल से किया । वहां इस देवशर्मा ने चोरी का मोका देखकर विचार किया कि ॥ २५ ॥


आज मैं धन की इच्छा से इस व्यास का वध करूंगा ॥ २६ ॥


दैव से प्राप्त इस व्यास के समस्त वस्तु का आज मैं चोरी करूँगा, मन में ऐसा निश्चय कर स्वयं वहां आया ॥ २७ ॥


व्यास का पूजन कर दण्डवत् पृथिवी पर गिरकर प्रणाम किया और बोला कि हे विप्र ! मैं अकिञ्चन (दरिद्र) हूँ, मैने आपको अपना शरीर दिया ॥ २८ ॥


मै आपका दास हूँ, आप यथासुख मेरी सेवा ग्रहण करें। और उसने सभों से अधिक कृत्रिम भक्ति दिखलाई ॥ २९ ॥


तदनन्तर सूर्यास्त हो जानेपर सभी लोग चले गये। वहां पर दो आदमी रह गये, उनमे से एक धूर्त और दूसरे व्यास ।। ३० ।।


हे राजन् ! बाद पौराणिक ने इधर उधर से सभी सामानों को एकत्रित कर एक वृहत् गहर बांधकर उसके मस्तक पर रख दिया ॥ ३१ ॥


उस बोक्त से नीचा शिर करके बारम्बार प्रसन्न होता हुआ जा रहा था। इस तरह दोनो चले मार्ग में उस दुष्ट ने विचार किया ।। ३२ ।।


तदनन्तर वह तालाब के मार्ग से धीरे २ व्यासजी के साथ जा रहा था,
तालाब के पास पहुंच कर जनसमुदाय में खुसकर भाग गया ॥ ३३ ॥


आगे जाकर मार्ग में पैर खिसक जाने से जलरहित कुआ मे गिर गया। और ब्राह्मण उसे न देखकर उस समय अत्यन्त व्याकुल हो गया ॥ ३४॥


तथा वहां पर बड़ा कोलाहल किया जिससे सभी लोग एकत्रित हो गये। तत्र व्यास ने कहा कि अहो ? उसी धूर्त ने मेरा सत्र हरण किया है ॥३५॥


उस दुष्ट का कैसे विश्वास किया, मैं मन्दबुद्धि हूँ । अज्ञात चरित्र वाले मनुष्य में जो निन्दित मनुष्य विश्वास करते है ॥३६॥


वे उसके वश में होकर नष्ट हो जाते है, जैसे बिडाल के वश में भूपक नष्ट हो जाता है। इस प्रकार व्यास के वचन को सुनकर पुरवासियों ने राजा से जाकर कहा कि ॥३७॥


पुर (नगर) के द्वार पर स्थित सभी लोग इधर उधर बाहर भीतर, भीतर रहने वाले और बाहर रहने वाले ॥ ३८ ॥


सभी स्थानों में चोर का अन्वेषण हुआ । तदनन्तर सूर्योदय होने पर जब दूतो ने पुनः अन्वेषण सुरू किया ॥३९॥


तब कुछ लोगों ने उसे कूप के अन्दर देखकर राजा से कहा । राजा की आज्ञा से उसे कूप के बाहर निकाला, उसके प्राण कुछ शेष रह गये थे ॥४०॥


उससे सभ वस्तु लेकर ब्राह्मण (व्यास) को दे दिया, इसके बाद उसके प्राण निकल गये ॥४१॥


वह दिव्य देहधारी होकर श्रेष्ठ विमान पर बैठकर पुरवासियो को प्रणाम कर बोला कि यह आप लोगों के अनुग्रह से मिला है ॥४२॥


तदनन्तर विस्मित होकर सभी लोगों ने ज्येष्ठमास माहात्म्य की प्रशंसा की। और उन पुरवासियों के मुख से माहात्म्य सुनकर वह भी बैकुण्ठ लोक को गया ॥ ४३ ॥


स्कन्दजी बोले कि हे विप्रलोग ! यह मैंने तुमसे विस्तार से पुराणश्रवण तथा अभक्त पातकी का माहात्म्य कहा ॥ ४४ ॥


जो भक्तिभाव से माहात्म्य का श्रवण करते हैं उनके श्रेष्ठ भाग्य क क्या कहना है। जो लोग मोहवश अपनी शक्ति के अनुसार व्यास का पूजन नहीं करते हैं ॥ ४५ ॥


वे दारिद्रय रोग से युक्त होते है, इसमें संशय नहीं हैं। जो लोग पुराण का श्रवण नहीं करते और वित्रिक्रम भगवान् का दर्शन नहीं करते है ॥ ४६ ॥


वे लोग मूक (गूंगा) बधिर (बहिरा) पड्डु होते हैं, इसमें संशय नहीं है। इस तरह स्कन्दजी 'के मुख से माहात्म्य श्रवण कर वे सच ब्राह्मण ॥ ४७ ॥


नन्दनवन के पुष्पो की स्कन्दजी पर वर्षा करने लगे और कुछ लोग नाचने लगे तथा कुछ लोग उपचारों से पूजन करने लगे ॥ ४८ ॥


श्रेष्ठ माहात्म्य श्रवण कर वे सब प्रसन्न हो गये और भी बारम्बार माहात्म्य पूछने लगे ॥ ४९ ॥


इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्य-वंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भाषाटीकायां त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ ॥


इति ज्येष्ठमासमाहात्म्यं समाप्तम् ॥
क्रमशः...〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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