संघर्ष : विकास का आलोक
पंकज शर्मा
मित्रों जीवन की प्रत्येक सार्थक यात्रा अपने साथ चुनौतियों का एक अपरिहार्य संसार लेकर चलती है। जो पथ पूर्णतः समतल एवं निर्विघ्न प्रतीत होता है, वह प्रायः आत्मविकास की दिशा में नहीं, बल्कि स्थिरता एवं जड़ता की ओर ले जाता है। प्रतिरोध, परीक्षाएँ एवं अवरोध केवल कठिनाइयाँ नहीं हैं; वे हमारे धैर्य, साहस एवं संकल्प के मौन शिक्षक हैं। इन्हीं के माध्यम से मनुष्य अपनी सीमाओं को पहचानता एवं उनसे आगे बढ़ने का सामर्थ्य अर्जित करता है।
सत्य, साधना एवं उत्कर्ष का मार्ग कभी सरल नहीं रहा। अग्नि में तपकर ही स्वर्ण अपनी आभा प्राप्त करता है, एवं संघर्षों से गुजरकर ही व्यक्तित्व परिपक्व बनता है। इसलिए बाधाओं से विचलित होने के स्थान पर उन्हें विकास के संकेत के रूप में स्वीकार करना चाहिए। अनेक बार वही कठिन क्षण, जो तत्काल पीड़ा का कारण प्रतीत होते हैं, भविष्य में हमारे जीवन की सबसे मूल्यवान उपलब्धियों का आधार बनते हैं।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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