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चुनावी लोकतंत्र और जनता की भूमिका : आखिर कब जागेगा मतदाता?

चुनावी लोकतंत्र और जनता की भूमिका : आखिर कब जागेगा मतदाता?

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

जब-जब चुनाव का समय आता है, तब-तब देश के राजनीतिक दलों और नेताओं का जनता के प्रति प्रेम अचानक उमड़ पड़ता है। जो नेता पाँच वर्षों तक जनता से दूर दिखाई देते हैं, वे चुनावी मौसम में घर-घर जाकर मतदाताओं के चरण स्पर्श करते हैं, उन्हें अपना परिवार बताते हैं और यह विश्वास दिलाते हैं कि उनकी हर समस्या का समाधान केवल वही कर सकते हैं। उस समय जनता को "जनार्दन", "मालिक", "भाग्यविधाता" और "लोकतंत्र का भगवान" जैसे विशेषणों से संबोधित किया जाता है। लेकिन चुनाव परिणाम आने और सरकार बनने के बाद वही जनता अक्सर यह सोचने पर मजबूर हो जाती है कि आखिर "हम आपके हैं कौन?"

लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि सत्ता जनता की होती है और जनप्रतिनिधि केवल जनता के सेवक होते हैं। किंतु वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में कई बार यह स्थिति उलटती हुई दिखाई देती है। चुनाव जीतने के बाद अनेक जनप्रतिनिधि स्वयं को जनता का सेवक नहीं, बल्कि शासक समझने लगते हैं। जनता की समस्याएँ, उनकी अपेक्षाएँ और उनके संघर्ष पीछे छूट जाते हैं, जबकि सत्ता, पद, प्रतिष्ठा और निजी हित प्राथमिकता बन जाते हैं।

भारतीय राजनीति में चुनावी वादों का इतिहास बहुत पुराना है। हर चुनाव में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी, भ्रष्टाचार-मुक्त शासन और विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि चुनाव के समय किए गए अनेक वादे चुनाव समाप्त होने के बाद फाइलों और भाषणों तक सीमित रह जाते हैं। जनता फिर अगले चुनाव तक इंतजार करती रहती है और समस्याएँ यथावत बनी रहती हैं।

हमारे पूर्वजों ने एक अत्यंत सार्थक कहावत कही है—"शिकारी आएगा, दाना डालेगा, लोभ में फँसना नहीं।" यह कहावत केवल जंगल के पक्षियों के लिए नहीं, बल्कि समाज और राजनीति के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है। चुनाव के समय मतदाताओं को विभिन्न प्रकार के प्रलोभन दिए जाते हैं। कहीं जाति के नाम पर वोट मांगे जाते हैं, कहीं धर्म और संप्रदाय के नाम पर भावनाएँ भड़काई जाती हैं, तो कहीं मुफ्त सुविधाओं और योजनाओं का लालच दिया जाता है। इन सबका उद्देश्य मतदाता को प्रभावित कर उसका वोट प्राप्त करना होता है।

दुर्भाग्यपूर्ण सत्य यह है कि भारत की जनता पिछले लगभग अस्सी वर्षों से बार-बार इन चुनावी जालों में फँसती रही है। आज भी बड़ी संख्या में मतदाता उम्मीदवार की योग्यता, ईमानदारी और कार्यक्षमता के बजाय जातीय समीकरणों, धार्मिक पहचान, व्यक्तिगत संबंधों या अल्पकालिक लाभों के आधार पर मतदान करते हैं। परिणामस्वरूप लोकतंत्र का स्तर कमजोर होता है और योग्य नेतृत्व के बजाय अवसरवादी राजनीति को बढ़ावा मिलता है।

यह भी एक कटु सत्य है कि अनेक जनप्रतिनिधि जनता की अपेक्षा अपने और अपने परिवार के राजनीतिक भविष्य को अधिक महत्व देते हैं। राजनीति में परिवारवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। एक पद पर पिता, दूसरे पर पुत्र, तीसरे पर पत्नी और चौथे पर अन्य परिजन दिखाई देते हैं। लोकतंत्र में जनसेवा की भावना की जगह कई बार राजनीति एक पारिवारिक व्यवसाय के रूप में विकसित होती नजर आती है। ऐसे में जनता के वास्तविक मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं।

हालाँकि इस स्थिति के लिए केवल नेताओं को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा। लोकतंत्र में जनता की भी समान जिम्मेदारी होती है। यदि मतदाता जागरूक, शिक्षित और उत्तरदायी होंगे तो कोई भी राजनीतिक दल उन्हें आसानी से भ्रमित नहीं कर सकेगा। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति मतदान है और सबसे बड़ा दायित्व भी। वोट केवल एक बटन दबाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश और समाज की दिशा तय करने का माध्यम है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि मतदाता चुनावी घोषणाओं और भावनात्मक नारों के बजाय जनप्रतिनिधियों के पिछले कार्यों का मूल्यांकन करें। जनता को यह देखना चाहिए कि जिसने वोट मांगा है, उसने पिछले पाँच वर्षों में क्षेत्र के लिए क्या किया, जनता के बीच उसकी उपस्थिति कितनी रही, भ्रष्टाचार और अपराध के प्रति उसका रवैया कैसा रहा तथा उसने जनहित के मुद्दों पर कितना संघर्ष किया।

लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं होना चाहिए। जनता को चुनाव के बाद भी अपने जनप्रतिनिधियों से प्रश्न पूछने चाहिए, उनके कार्यों की समीक्षा करनी चाहिए और जनहित के मुद्दों पर निरंतर दबाव बनाए रखना चाहिए। जब तक जनता अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र का वास्तविक लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँच पाएगा।

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसकी सफलता केवल संविधान, संसद या सरकारों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि करोड़ों जागरूक मतदाताओं पर निर्भर करती है। यदि जनता वोट देते समय विवेक, ईमानदारी और राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी, तो राजनीति की दिशा भी बदलेगी और शासन की गुणवत्ता भी सुधरेगी।

समय आ गया है कि हम चुनावी नारों और प्रलोभनों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता दें। हमें यह याद रखना होगा कि लोकतंत्र में नेता जनता से बड़े नहीं होते, बल्कि जनता ही लोकतंत्र की वास्तविक मालिक होती है। जिस दिन मतदाता इस शक्ति को पहचान लेगा, उस दिन राजनीति भी बदलेगी, व्यवस्था भी बदलेगी और देश का भविष्य भी अधिक उज्ज्वल होगा।

जनता को केवल वोट देने वाला मतदाता नहीं, बल्कि लोकतंत्र का सजग प्रहरी बनना होगा। तभी चुनाव लोकतंत्र का उत्सव बनेंगे, अन्यथा वे केवल सत्ता प्राप्ति का साधन बनकर रह जाएंगे।

— डॉ. राकेश दत्त मिश्र
सामाजिक चिंतक, लेखक एवं जनहित विषयों के प्रखर वक्ता
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