सर्वे संतु निरामया
डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी
पुराणों के आधार पर शिक्षा वैज्ञनिकों ने शिक्षा के चार स्तंभ माने हैं ।चारों में से एक भी कमजोर हो जाता है तो इमारत गिरने से कोई रोक नहीं सकता ।परंतु इन स्तंभों के अतिरिक्त बुनियाद पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है ।दृष्टि के अनुरूप सृष्टि अपेक्षित है ।संस्कार सामंतवादी ,रहन-सहन पूंजीवादी, नारे समाजवादी और व्यवहार विसम्वादी होने से स्वराज्य अंतर्विरोधी व्यवस्था का शिकार हो गया है ।"नन वॉयलेन्स रेसिस्टेन्स नहीं, नन वॉयलेन्स असिस्टेंट इन टर्म्स ऑफ़ राइट थिंकिंग एंड वर्किंग "की आवश्यकता है । ,निषेधात्मक क्षेत्रों में लगने वाली शक्ति अगर विधायक क्षेत्रों मे लगे तो दृष्टि और सृष्टि दोनो में बदलाव संभव हो सकेगा।क्योंकि विधायक क्षेत्रों में लगाने वाली शक्ति विधायक क्षेत्रों मे ही लगाने से सृष्टि की एकता सामुदायिक जीवन की संपन्नता, शिक्षा की मूल्य परकता और गणतंत्र की गुणधर्मिता उजागर होती है ।सत्ता से अधिक सेवा ,शान से अधिक सादगी, शस्त्र से अधिक शास्त्र ,ज्ञान से अधिक सदाचार ,स्पर्धा से अधिक सहयोग ,संघर्ष से अधिक सृजन ,युद्ध से अधिक शांति के प्रति प्रतिबद्धता आज की शिक्षा की मांग है ।शिक्षा जीवन के कठोर धरातल पर उतरे स्वार्थ ,परार्थ ,परमार्थ के पदार्थ पाठ से अधिक आवश्यकता है सामुदायिक जीवन को सत् चित् आनंदमय बनाने की ।जीवन शिक्षण यही है ।
उपर्युक्त चारों स्तंभों में पहला स्तंभ है -अध्येता । अध्ययन करने वाला यानी छात्र ।शिक्षा विभाग का सारा बितान अध्येता का ही केंद्राभिसारी भी है और केन्द्रापसारी भी जो आज सरकारी नियमों का शिकार बना हुआ है ।शिक्षा के अधिकार को कानूनी मान्यता मिल गई ,परंतु एक प्रश्न खड़ा है कि वह मान्यता किन बच्चों के लिए मिली ।अपने संविधान के अनुच्छेद 45 में तो यह अधिकार पहले से ही था । फिर इसका संशोधन आया ।इसमें जीने के अधिकार की तरह ही शिक्षा को भी मौलिक अधिकार मान लिया गया ।कोठारी आयोग ने पड़ोसी विद्यालय की सिफारिश की थी जिस पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति की मुहर लग गई। पड़ोसी विद्यालय अगर निजी विद्यालय है तो उसमें 25% छात्र वैसे समाज से नामांकित होंगे जिनकी पहुंच विद्यालय तक नहीं है ।वैसे भी सरकारी विद्यालयों में प्रायःवैसे ही छात्र नामांकन लेते हैं जिनकी पहुंच निजी विद्यालयों तक नहीं होती ।इस पहुंच में धन शक्ति ,जन शक्ति ,महाजन शक्ति ,ज्ञानीजन शक्ति ,सम्मानितजन शक्ति ,सामजिक जन शक्ति ,रक्त जन शक्ति यानी तमाम शक्तियां हैं ।कुछ तो समाज के डर से ,कुछदेखा देखी में निजी विद्यालयों में बच्चों को भेजना गर्व की बात समझते हैं ,अन्यथा उनके बालक हीन भावना से ग्रसित रहेंगे और ऊँचे दहेज वाले विवाहादि -लाभ से वंचित रह जाएंगे ।वैसे बच्चों पर भी सरकारी विद्यालयों के विसात विछे हैं जिनके सरकारी विद्यालयों में नामांकन की मजबूरी है ।
फिर सरकारी विद्यालयों के अध्येताओं पर कोई नियम नहीं चलता या चलाया जा सकता ,क्योंकि वह इसे अपना समझते हैं ।एक सर्वे के अनुसार 39 विद्यालयों में अभिभावक- शिक्षक बैठक की घोषणा करवाई गई ।परिणाम बड़ा निरासाजनक रहा । अभिभावकों की कुल उपस्थिति औसतन 5 से 7 तक हुई ।एक विद्यालय में एक प्रभावशाली व्यक्ति की पोती का नाम इसलिए काट दिया गया क्योंकि उसके पिता एवं माता दोनों इसी तरह की बैठक में उपस्थित नहीं हुए थे ।लगातार दो बैठकों में सिर्फ पिता ही गए थे ।विद्यालय का नाम देकर उसे विख्यात नहीं करना चाहता. नहीं उस साहित्यकार को अपमानित । अभिभावक इन विद्यालयों में अपने पाल्यों को पढ़ाकर स्वयं परेशान रहते हैं । वे उनका कठिन अर्थ - दोहन मधुर भाव से सहते रहते हैं ।एक ही शिक्षक के दो पुत्र अगर एक निजी विद्यालय में पढ़ता है दूसरा सरकारी में ,तो दोनों के लिए उनका व्यवहार घर पर भी अलग -अलग होता है ।
25% वंचित छात्रों का नामांकन तो किसी विद्यालय में हो जाएगा परंतु सरकार उन विद्यालयों को क्या-क्या खर्च देगी ।इन विद्यालयों में नामांकन शुल्क एवं शिक्षण शुल्क के अतिरिक्त युनिफॉर्म शुल्क, सदन यूनिफॉर्म शुल्क, पुस्तक -कॉपी -कलम शुल्क, बैंज,डायरी बेल्ट एवं परिचय-पत्र शुल्क,बिभिन्न जयंतियों के कार्यक्रम शुल्क ,अन्य कई प्रकार के शुल्क प्रत्यक्ष या परोक्ष लिए जाते हैं ।क्या सरकार सभी प्रकार के शुल्क की अयादगी करेगी ?
अभी कुछ दिन पूर्व राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण परिषद् भोपाल के पूर्व प्राध्यापक प्रोफेसर रमेश दवे ने मध्य प्रदेश के छात्रों की एक संसद बुलाई जिसमें मध्य प्रदेश के 15 जिलों के बालकों ने भाग लिया ।उसमें 50-55 अभिभावक, कुछ अतिथि एवं मीडिया कर्मी भी उसमें सहभागी बने ।वहाँ पर 16 साल के बच्चों ने जो प्रश्न किया, चौंकाने वाला था। जैसे ही कहा गया कि अब आपको अधिकार मिल गया है कि 25% पड़ोसी विद्यालय में आपका नामांकन होगा ,
कक्षा 8 की एक बच्ची ने टिप्पणी की कि –
25% आरक्षण हम गरीबों के लिए नहीं अमीरों के लिए होना चाहिए और आरक्षण निजी विद्यालयों में नहीं सरकारी विद्यालयों में होना चाहिए ।इससे स्कूल की सूरत और सीरत दोनों बदलेगी ।निजी विद्यालयों में आरक्षण से 25% को ही लाभ होगा परंतु सरकारी विद्यालयों में आरक्षण से 75% को लाभ मिलेगा ।
दूसरा प्रश्न था क्या तुम्हें स्कूल से डर लगता है ?
इस प्रश्न का जवाब था -हाँ !पूछने पर बताया कि विद्यालय में कोई भी प्यार से बातें नहीं करते हैं ।परीक्षा में फेल कर देंगे ,का डर दिखाया जाता है ।यानी शालाएँ भय मुक्त नहीं हैं । बिहार की स्थिति भी इससे हटकर कुछ नहीं है । यहाँ भी शालाएँ भय मुक्त नहीं हैं । बच्चे पुस्तक के साथ विद्यालय नहीं आते हैं ।सुबह कोचिंग या ट्यूशन पढ़ने आते हैं ।एक अनुमंडल के विद्यालयों का सर्वेक्षण करवाया गया ।छात्रों की वास्तविक उपस्थिति औसतन 50% से अधिक नहीं रहती ,बिहार में नवम एवं दशम वर्ग में अध्ययन करने वाले छात्रों एवं छात्राओं को मुख्यमंत्री बालक बालिका साइकिल योजना के अंतर्गत साइकिल क्रय करने हेतु 2500 रुपए दिए जाते हैं ।उस राशि- प्राप्ति के बाद उपस्थिति और भी क्षीण हो जाती है। इस उपस्थिति में 25% छात्र भाषा की पुस्तक लेकर नहीं आते ।25% छात्रों के पास सिर्फ एक कॉपी होती है ।लेकिन ट्यूशन में प्रायः छात्र कॉपी -किताब के साथ जाते हैं ।स्पष्ट है विद्यार्थियों क विस्वास विद्यालयों एवं शिक्षकों पर से उठ गया है ,यह शिक्षकों के लिए अति ही चिन्तनीय है ।
दूसरा स्तंभ अभिभावक हैं ।अभिभावकों की स्थिति कुछ ऐसी है ।मध्य प्रदेश के 15 जिले के सभी अभिभावकों को बुलाने का जोरदार प्रयास किया गया ।यहाँ बच्चों को मुद्रित आमंत्रण पत्र उनके पिता -माता का नाम लिख कर दिया गया ।कई सौ बच्चों को यह पत्र दिया गया ।मात्र 50 अभिभावक जूटे जिनमें तीन युवक आए थे । मैंने आरोप पत्र के नाम पर पत्र दिया ।उस पर लिखा था- आप नहीं आएँगे तो आपके पुत्र /पाल्य का नाम काट कर टी सी घर भेज दिया जाएगा ।इस बार करीब 40 अभिभावक आए जिनमें 22भाड़े पर आए थे ।वे बास्तविक माता -पिता -अभिभावक नहीं थे ।इस वार ओ एम आर सीट में अभिभावक के हस्ताक्षर की भूमिका थी, उन्हें रोक दिया गया ।अंत में घर से हस्ताक्षर करा कर लाने को दिया गया । यही स्थिति बिहार के विद्यालयों में भी कमोबेश रही है ।
इस तथ्यपूर्ण आँकड़ों का अर्थ है कि अभिभावक सरकारी विद्यालयों में अपने पाल्यों को भेजकर निश्चिंत इसलिए हो जाते हैं कि वे जानते हैं कि इससे अधिक कुछ नहीं किया जा सकता है । वहीं निजी विद्यालयों के कठिन आदेश उन्हें सुखद लगते हैं ,आकर्षक लगते हैं । अभिभावक शिक्षा को सही रूप में समझें, मानें और इसपर अमल करें तो समस्या का त्वरित समाधन संभव हो सकता है ।
तीसरा स्तम्भ हैं अध्यापक ।अध्यापक बालकों की संवेदना को नहीं समझते ।बालकों की किशोरावस्था में उत्पन्न समस्याओं का निदान उचित ढंग से नहीं होने से समस्या दर- समस्या बढ़ती जाती है । 60% शिक्षक विद्यालय से सामान्य संबंध रखते हैं ।वे आते हैं और जाते हैं ।वे अपने को पहचानते नहीं। 20% शिक्षक सिर्फ पढ़ाने से मतलब रखते हैं ।वे अपने को पहचानते हैं,परन्तु मानते नहीं। 20% अध्यापक पूरी तैयारी से विद्यालय आते हैं । उन्हींपर शिक्षा,समाज और शिक्षालय का बोझ है ।वे अपने को पहचानते भी हैं और मानते भी हैं ।
संप्रत्ति एक आदर्श आचार संहिता की आवश्यकता है जिससे अध्यापक अध्येता के संपर्क में रहें, फिर दोनों के बीच एक संबंध स्थापित हो ।अध्येता के आदर सम्मान एवं अध्यापक के स्नेह में सामंजस्य होना चाहिए तभी अध्यापक माता- पिता -पुत्र एवं पथ -प्रदर्शक की भूमिका निभाने में सक्षम होंगे ।
अध्यापक को नया -नया ज्ञान प्राप्त करना चाहिए ,वर्धा की शिक्षकों की एक महती सभा में विनोबा जी में कहा था कि अध्ययन के बिना अध्यापक नहीं हो सकता । जो अनबरत अध्ययन करता है वही अध्यापक हो सकता है ।वही दीपक दूसरे दीपक को जला सकता है जिसमें स्वयं जलने की क्षमता है ।इसलिए शिक्षकों को कम से कम तीन-चार घंटे का अध्ययन- स्वाध्याय निश्चित रूप से प्रतिदिन करना चाहिए ।इसके साथ ही उन्हें समाज में निष्पक्ष रहना चाहिए ।
चौथा स्तंभ हैं विद्यालय । शालाएँ आकर्षक हों। रंग रोगन की व्यवस्था तो हो गई है परन्तु आंतरिक आकर्षण बढ़ाने की आवश्यकता है । माननीय मंत्री महोदय माननीय विधायक, माननीय विधान पार्षद ,माननीय सांसदों के बच्चे भी वहीं सरकारी विद्यालयों में अनिवार्य रूप से पढ़ें, क्षेत्र के अधिकारी के बच्चे भी निश्चित रूप से वहीं पढ़ें। उसी पढ़ाई के लिए बाहर जाएँ जिसकी व्यवस्था क्षेत्र में नहीं है ।इससे विद्यालय का आकर्षण बढ़ेगा ,आंतरिक आकर्षण में वृद्धि होगी ।
वैदिक काल में शालाएँ राजा के प्रभाव से मुक्त हुआ करती थीं ।अध्येता अध्यापक के पास ही रहते थे ।दोनों का व्यय-भार राजा ही उठाते थे । छात्रों को कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। वे भीक्षाटन कर आश्रम का खर्च चलाते थे ।
वर्तमान पद्धति में राज्य सरकार विद्या (शिक्षा) का भार वहन करती है ,फिर भी निजी विद्यालयों की तरह सरकारी विद्यालय आकर्षक नहीं लगते । उनके कई कारक हैं जिनकी विवेचना आवश्यक नहीं है ।परंतु इन नीतियों से के कारण आंतरिक असंतोष को स्पष्ट दिखाई पड़ता है ।
आज समाज की आवश्यकता हो गई है - शिक्षा में सुधार और प्रारूप में परिवर्तन ।इसके लि्ए -
शिक्षकों का सम्मान - सरकार द्वारा शिक्षकों के साथ सम्मान जनक व्यवहार होगा तो समाज में भी उन्हें सम्मान मिलेगा ।इससे उन्हें अपने को पहचानने का अवसर मिलेगा और वे समाज में अन्य लोगों के साथ अपनी पहचान बनाने में सफल होगें
समान काम के लिए समान बेतन ।
सभी शिक्षक एक समान हैं । उनका बेतन भी एक समान होना चाहिए ।बेतन में अंतर सिर्फ अनुभव के आधार पर हो।
सरकारी तौर पर सुरक्षित भविष्य एवं एक लुभावना वेतनमान इनके लिए भी होना चाहिए ।
आधारभूत प्रशिक्षण का व्यवसायिक होना - खासकर बी एड का कोर्स अब 2 साल का हो गया है ,परंतु कोर्स नियमित नहीं चलता ।उसमें अध्यापक अध्ययन शील नहीं होते। कुछ तो ऐसे भी कॉलेज चलते हैं जहाँ बच्चे नामांकन लेकर आते हैं और सिर्फ परीक्षा देने ही जाते हैं । ऐसी स्थिति में जो खुद नहीं बन सका दूसरे को बनाने का क्या अधिकार प्राप्त करेगा। किसी भी व्यवसाय कोर्स की पढ़ाई 3 वर्षों से कम नहीं होती ।
प्रशिक्षण संस्थानों का निजीकरण - किसी किसी संस्था में तो बिना अपने संस्थान के दर्शन किए ,पाठ्यक्रम से रूबरू हुए ,किसी प्रकार नामांकन हुआ और परीक्षा हुई। एक पन्ना कागज प्रमाण पत्र के रूप में प्राप्त हो गया । इन्हें रोका जाना चाहिए ।
प्रशिक्षण इस तरह हो कि प्रशिक्षु आनंद के साथ अपनाएँ।
समय आ गया है कि छात्र अपनी पहचान बनाएँ ,स्वाध्याय पर वल दें ।अभिभावक अपने पुत्र - पाल्य की अभिरुचि समझें ,जबरण कोटा भेज कर पैसा छापने की मशिन न बनाएँ,उन्हें रुचि के अनुसार जीवन के लिए तैयार होने दें ।
तभी शिक्षा अपना काम करेगी और हम घोष करेंगे - सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित् दुख भाग् भवेत्॥
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