शांति-दूत श्रीकृष्ण
रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"सभा में शांति का माधव अनोखा आलाप देते हैं,
बुझे संबंध फिर से प्रेम का प्रताप देते हैं।
"धरा नहीं, बस पाँच ग्राम पांडवों को दे दो,
"बचेगा वंश कौरव का, सद्भाव का जाप देते हैं।
"सुई की नोक भर भूमि नहीं दूँगा- दुर्योधन कहता है
"अहंकारी सदा अपने हृदय को पाप देते हैं।
सभा में भीष्म, विदुर, द्रोण सब सिर झुकाए बैठे थे,
जहाँ अभिमान पलता है, वहाँ बस श्राप देते हैं।
"मत बाँध अपनी नियति हठ की जंजीरों से",
समय के हाथ राजा को भीषण परिणाम देते हैं।
अभी भी लौट सकता है, युद्ध भी रुक सकता,
विवेकी लोग अवसर को कहाँ संताप देते हैं।
मगर वह हँस पड़ा सुनकर, सभा का मान ठुकराया,
कुबुद्धि लोग ही खुद को गहरा प्रतिघात देते हैं।
जिसे मद हो सत्ता का, स्वयं को जान नहीं सकता,
उसे इतिहास के पन्ने सदा अभिशाप देते हैं।
तभी हस पड़े माधव, विराट स्वरूप अपनाया,
देवता भी उस दिव्यता का मौन अलाप देते हैं।
थर-थर काँपी राजसभा, डोल उठा पृथ्वी सारा,
दिखाकर रूप ईश्वर दुष्ट को संताप देते हैं।
न मानी बात जब उसने, बजा रणभेरी का नगाड़ा,
कुरुक्षेत्र के योद्धा लहू का हिसाब देते हैं।
'राकेश' सीख इस कथा की, त्याग दो दंभ और अन्याय,
जो कृष्ण-वचन ठुकराते, उन्हें इतिहास विलाप देते हैं।
पटल पर उपस्थित महानुभावों को यथायोग्य प्रणमाशीष! महाभारत का वह दृश्य जब योगेश्वर श्रीकृष्ण शांति का अंतिम प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर की सभा में जाते हैं, इतिहास का सबसे ओजस्वी प्रसंग है। दुर्योधन के अहंकार और भगवान के विराट स्वरूप के इसी द्वंद्व को मैंने अपनी पंक्तियों में पिरोने का प्रयास किया है। मेरी नई ओजपूर्ण रचना *"शांति-दूत श्रीकृष्ण"* आपके समक्ष प्रस्तुत है। इसे पढ़ने के उपरांत, अंतर्मन में जोश को महसूस आवश्य किए होंगे। और अंत में अपनी प्रतिक्रिया अवश्य देंगे। 🙏🙏
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