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प्राचीन बिहार की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत

प्राचीन बिहार की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत

सत्येन्द्र कुमार पाठक
सनातन कालगणना और वैश्विक इतिहास के फलक पर भारत का पूर्वी भूभाग, जिसे आज हम ‘बिहार’ के नाम से जानते हैं, केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं बल्कि मानव सभ्यता, दर्शन, राजनीति और कल्प-मन्वंतरों की आध्यात्मिक चेतना का उद्गम स्थल है। ऋग्वेद की आदिम ऋचाओं से लेकर महाभारत के महायुद्ध तक और उपनिषदों के गूढ़ शास्त्रार्थों से लेकर बौद्ध-जैन दर्शन के वैश्विक विस्तार तक, इस भूमि ने चक्रवर्ती राजाओं और त्रिकालदर्शी ऋषियों को जन्म दिया है। पौराणिक कालक्रम—स्वायंभुव मन्वंतर (सृष्टि का आदि काल) तथा वैवस्वत मन्वंतर (वर्तमान काल)—के आधार पर प्राचीन बिहार के सात महा-साम्राज्यों और सांस्कृतिक क्षेत्रों: कीकट, मगध, अंग, वज्जि (बज्जि), मिथिला (विदेह), करुष और हिरण्य प्रदेश के राजाओं, ऋषियों, उनके युगांतरकारी अवदानों, समय और भौगोलिक अवस्थिति का वेदों, पुराणों एवं महाकाव्यों के संदर्भों के साथ एक प्रामाणिक एवं विस्तृत अन्वेषण करेंगे। साथ ही, इस पावन भूमि के तीन शीर्ष केंद्रों—राजगीर, गया और पटना के ऐतिहासिक व नदी-संगम जनित निर्माण का तार्किक विश्लेषण करेंगे।
सात महा-साम्राज्यों का मन्वंतर-क्रम के अनुसार ऐतिहासिक व आध्यात्मिक अवदान में प्राचीन बिहार के सात सांस्कृतिक क्षेत्र था । कीकट , मगध में प्राकृतिक चेताना व अखंड राजशाही , अंग में दानवीरता ब वाणिज्य , बज्जि में विश्व का प्रथम लोकतंत्र , मिथिला में ज्ञान , ज्ञान , अद्वैत वेदांत और करुष एवं हिरण्य प्रदेश में सैन्य कौशल व तपोभूमि थी । स्वायंभुव मन्वंतर में कीकट प्रदेश एवं मगध साम्राज्य (प्राकृतिक संस्कृति से अखंड राजशाही तक) सृष्टि के सुदूर आदिकाल में, वर्तमान गया, राजगीर और पुनपुन नदी के मध्य फैले दक्षिण बिहार के सघन वन और गोरथगिरि (बराबर पहाड़ियों) के पर्वतीय क्षेत्र है। : इस काल में राजाओं की भौगोलिक सीमाएं निश्चित नहीं थीं। स्वायंभुव मनु के प्रतापी पुत्र राजा प्रियव्रत ने जब संपूर्ण पृथ्वी को सात द्वीपों में विभक्त किया, तब इस क्षेत्र को जम्बूद्वीप के एक विशिष्ट ऊर्जा केंद्र के रूप में चिन्हित किया गया। इस काल में भृगु वंश के आदि ऋषियों और महर्षि च्यवन (प्रथम) की परंपरा ने इस भूमि को अपनी तपोस्थली बनाया। स्वायंभुव काल में कीकट को एक ऐसी ‘प्राकृतिक चेतना भूमि’ माना गया जो कृत्रिम कर्मकांडों से मुक्त थी। यहाँ के आदि ऋषियों ने जड़ी-बूटियों के अनुसंधान और एकांत ध्यान के माध्यम से प्रकृति-पूजा की नींव रखी, जिसने आगे चलकर मगध के स्वतंत्र दार्शनिक चिंतन की पृष्ठभूमि तैयार की।
वैवस्वत मन्वंतर काल: द्वापर युग से लेकर महाजनपद काल (छठी शताब्दी ईसा पूर्व) तक; गंगा के दक्षिण का संपूर्ण मैदान था । राजा प्रमगंद: ऋग्वेद (3.53.14) में कीकट के शासक प्रमगंद का उल्लेख है। वे एक अत्यंत शक्तिशाली और स्वतंत्र चेतना वाले शासक थे। उन्होंने वैदिक कर्मकांडों से इतर एक समानांतर, प्रकृति-आधारित संस्कृति का नेतृत्व किया, जो मगध के मूल निवासियों के स्वाभिमान का प्रतीक थी। महाराज बृहद्रथ और जरासंध: द्वापर युग (महाभारत काल) में वैवस्वत मनु के वंशज राजा कुरु के समकालीन राजा बृहद्रथ ने मगध के प्रथम संगठित साम्राज्य की स्थापना की। उनके प्रतापी पुत्र जरासंध ने पाँच पहाड़ियों से घिरे गिरिव्रज को राजधानी बनाकर उत्तर भारत के ८६ राजाओं को पराजित कर चक्रवर्ती पद प्राप्त करने का प्रयास किया। जरासंध का सैन्य कौशल और मल्लविद्या की परंपरा मगध की अजेयता का आधार बनी। राजा बिम्बिसार और अजातशत्रु: कलयुग के संधिकाल (छठी-पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व) में हर्यक वंश के इन राजाओं ने कूटनीतिक विवाहों और आक्रामक सैन्य नीतियों (जैसे रथमुसल और महाशिलाकंटक का आविष्कार) के माध्यम से मगध को भारत का पहला अखंड साम्राज्य बनाया। ऋषि एवं मनीषी:में महर्षि दीर्घतमा, महात्मा बुद्ध और भगवान महावीर। इसी काल में गयासुर के आत्मत्याग की पौराणिक घटना हुई, जिससे गया को संपूर्ण ब्रह्मांड में ‘पितृमुक्ति का सर्वोच्च तीर्थ’ होने का शाश्वत वरदान मिला। महात्मा बुद्ध को बोधगया में उरुवेला के वनों में ज्ञान प्राप्त हुआ, जिससे मगध विश्व की आध्यात्मिक राजधानी बन गया।
मिथिला / विदेह साम्राज्य (ज्ञान, न्याय और अद्वैत वेदांत का शिखर) में स्वायंभुव मन्वंतर काल का : त्रेतायुग के पूर्व, मन्वंतरों के संधिकाल में; गंगा नदी के उत्तर में हिमालय की तराई तक फैला मैदानी भूभाग। राजा एवं ऋषि: राजा निमि (इक्ष्वाकु के पुत्र, जो मन्वंतर संक्रमण के आदि पुरुष माने जाते हैं)। : राजा निमि ने इस क्षेत्र में एक विशाल और दीर्घकालिक यज्ञ का अनुष्ठान किया था। महर्षि वशिष्ठ के श्राप के कारण जब उनका भौतिक शरीर शांत हुआ, तब उपस्थित ऋषियों ने उनके मृत शरीर का मंथन किया। इस दिव्य मंथन से एक परम तेजस्वी बालक का प्राकट्य हुआ, जिसे ‘मिथि’ कहा गया। चूंकि वे मृत शरीर के मंथन से उत्पन्न हुए थे, इसलिए वे ‘जनक’ (पिता के बिना जन्म लेने वाले) कहलाए और देह के बंधनों से मुक्त चेतना के कारण उन्हें ‘विदेह’ कहा गया। मिथि जनक ने ही इस भूभाग पर ‘मिथिला’ नगरी की स्थापना की। इस प्रकार स्वायंभुव काल में ही देह-अनासक्ति (विदेह अवस्था) की दार्शनिक आधारशिला यहाँ रखी जा चुकी थी। वैवस्वत मन्वंतर काल त्रेतायुग (रामायण काल) से लेकर उत्तर-वैदिक काल तक; वर्तमान जनकपुर, सीतामढ़ी, दरभंगा और मधुबनी का क्षेत्र। राजर्षि सीरध्वज जनक: त्रेतायुग में विदेह वंश के २१वें राजा सीरध्वज जनक ने मिथिला के गौरव को चरम पर पहुँचाया। वे एक महान शासक होने के साथ-साथ ब्रह्मज्ञानी ‘राजर्षि’ थे। राज्य में पड़े अकाल को दूर करने के लिए जब उन्होंने स्वयं सोने का हल चलाया, तब भूमि से माता सीता का प्राकट्य हुआ, जो संपूर्ण भारतीय वांग्मय में त्याग, मर्यादा और शक्ति का सर्वोच्च आदर्श बनीं। राजा जनक का महल केवल सत्ता का केंद्र नहीं, बल्कि वैश्विक दार्शनिक विमर्श की ज्ञान-पीठ था। ऋषि एवं विदुषियाँ:में महर्षि याज्ञवल्क्य: शुक्ल यजुर्वेद के द्रष्टा और बृहदारण्यक उपनिषद के मुख्य प्रणेता। उन्होंने राजा जनक की सभा में अद्वैत वेदांत के रहस्यों को प्रतिपादित किया। गार्गी वाचकनवी और मैत्रेयी: भारत के इतिहास में स्त्री-विद्वता की शिखर प्रतिमान। गार्गी ने राजा जनक की राजसभा में महर्षि याज्ञवल्क्य को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी थी, जो यह सिद्ध करता है कि वैदिक काल में मिथिला में स्त्री-शिक्षा और वैचारिक स्वतंत्रता अपने उच्चतम स्तर पर थी। महर्षि गौतम: न्याय दर्शन (Logic/Epistemology) के प्रणेता, जिनका आश्रम मिथिला में ही स्थित था, जहाँ उनकी पत्नी अहल्या का उद्धार भगवान श्री राम ने किया था। मिथिला ने विश्व को ‘कर्मयोग’ (बिना आसक्ति के राज-काज चलाना) सिखाया और भारतीय दर्शन को ‘न्याय सूत्र’ तथा उपनिषदों का अद्वैत ज्ञान दिया।
अंग साम्राज्य (शिल्प, अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य और दानवीरता का प्रतिमान) में वैवस्वत मन्वंतर काल (मुख्य विकास)का : पौराणिक इतिहास में अंग, वज्जि, और करुष के सुस्पष्ट और सुव्यवस्थित राजवंशों का विस्तृत वर्णन मुख्य रूप से वैवस्वत मन्वंतर के अंतर्गत ही प्राप्त होता है।: त्रेतायुग और द्वापर युग; वर्तमान भागलपुर, मुंगेर और संथाल परगना के सीमावर्ती क्षेत्र। इसकी राजधानी चम्पा नगरी (चम्पामालिनी) थी। राजा तितिक्षु और राजा अंग: वैवस्वत मनु के वंश में राजा महामनस् के पुत्र तितिक्षु ने पूर्व दिशा में आकर साम्राज्य स्थापित किया। उनके प्रतापी वंशज राजा अंग के नाम पर ही इस पूरे साम्राज्य का नाम ‘अंग’ पड़ा। राजा लोमपाद: त्रेतायुग में ये अयोध्या के राजा दशरथ के परम मित्र थे। इनके शासनकाल में जब अंग देश में भयंकर अकाल पड़ा, तब इन्होंने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए महान आध्यात्मिक उपाय किए। द्वापर युग में दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा घोषित किया। कर्ण ने चम्पा नगरी को अपनी कर्मभूमि बनाया। अपनी निष्ठा, अटूट मित्रता और प्रतिदिन सुबह सूर्योपासना के समय सर्वस्व दान कर देने की उनकी वृत्ति के कारण, वे इतिहास में ‘दानवीर कर्ण’ के रूप में अमर हुए। उन्होंने अंग देश की सैन्य और कलात्मक शक्ति को सुदृढ़ किया। ऋषि ऋष्यशृंग (श्रृंगी ऋषि)। राजा लोमपाद के निमंत्रण पर विभांडक ऋषि के पुत्र श्रृंगी ऋषि ने अंग देश की धरती पर कदम रखा, जिससे उनका ब्रह्मचर्य-तेज वर्षा का कारण बना और अंग देश का अकाल समाप्त हुआ। इसके पश्चात, इन्हीं श्रृंगी ऋषि की देखरेख में अयोध्या में राजा दशरथ के लिए ‘पुत्रेष्टि यज्ञ’ संपन्न हुआ, जिसके परिणामस्वरूप भगवान श्री राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का अवतार हुआ। अंग की राजधानी चम्पा उस समय की वास्तुकला का अद्भुत नमूना थी। यहाँ के व्यापारियों ने नौकाओं के माध्यम से सुवर्णद्वीप (आधुनिक इंडोनेशिया, मलयेशिया, श्रीलंका) के साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध स्थापित किए।
बज्जि महासंघ (विश्व के प्रथम सफल लोकतंत्र की जननी) में
कब और कहाँ: वैवस्वत मन्वंतर के उत्तरार्ध से लेकर बुद्ध काल (छठी शताब्दी ईसा पूर्व) तक; गंगा के उत्तर में और गण्डक नदी के पूर्व का क्षेत्र, जिसकी केंद्रीय राजधानी वैशाली थी। राजा विशाल: इक्ष्वाकु वंश के राजा विशाल ने इस क्षेत्र में एक अत्यंत सुंदर और सुरक्षित नगर की स्थापना की, जिसे उनके नाम पर ‘विशाल नगरी’ या ‘वैशाली’ कहा गया। महाराज चेतक: लिच्छवी गणराज्य के प्रधान और वज्जि संघ के नायक राजा चेतक थे। वे लोकतांत्रिक मूल्यों, कूटनीति और न्यायप्रियता के महान संरक्षक थे। उनकी बहन त्रिशला भगवान महावीर की माता थीं और उनकी पुत्री चेलना का विवाह मगधराज बिम्बिसार से हुआ था, जिसने उत्तर भारत की राजनीति को एक सूत्र में पिरोया। आचार्य अलार कलाम और भगवान महावीर। सांख्य दर्शन के उद्भट विद्वान आचार्य अलार कलाम इसी क्षेत्र के तपोवनों में निवास करते थे, जिनसे राजकुमार सिद्धार्थ (बुद्ध) ने गृहत्याग के पश्चात अपनी प्रथम ध्यान दीक्षा ली थी। जैन धर्म के २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म वैशाली के कुण्डग्राम (ज्ञात्रिक कुल) में हुआ था। युगांतरकारी अवदान: वज्जि संघ ८ कुलों (लिच्छवी, विदेह, ज्ञात्रिक आदि) का एक महासंघ था। इसका विश्व इतिहास में सबसे बड़ा अवदान "विश्व की प्रथम गणतांत्रिक शासन प्रणाली" (First Democracy of the World) देना है। यहाँ राजा का पद वंशानुगत न होकर ‘संस्थागार’ (पार्लियामेंट) में मतदान (शलाका ग्रहण) द्वारा तय होता था। इसकी न्याय प्रणाली में ‘अष्टकुलक’ (आठ स्तरीय न्यायालय) की व्यवस्था थी, जो आधुनिक न्यायपालिका के अत्यंत निकट है।
करुष प्रदेश (वीरता, सैन्य कौशल और सिद्धाश्रम की शौर्यभूमि) में वैवस्वत मन्वंतर; वर्तमान गंगा - सोन नदी की घाटी का क्षेत्र, जिसमें भोजपुर, रोहतास , कैमूर बक्सर), कैमूर और रोहतास की पहाड़ियों का इलाका सम्मिलित है। वैवस्वत मनु के कारूष नामक पुत्र से इस वंश का आरंभ माना जाता है। महाभारत काल में यहाँ के राजा वृद्धशर्मा (जिनका विवाह कुंती की बहन से हुआ था) और दंतवक्र थे। करुष देश के योद्धा अपनी असाधारण शारीरिक शक्ति, धनुर्विद्या और अदम्य साहस के लिए संपूर्ण भारतवर्ष में प्रसिद्ध थे। महाभारत के युद्ध में यहाँ की चतुरंगिणी सेना ने पांडवों का साथ देकर अपनी धर्मनिष्ठा का परिचय दिया था।: महर्षि विश्वामित्र। करुष प्रदेश के अंतर्गत आने वाले बक्सर वन क्षेत्र में महर्षि विश्वामित्र का ‘सिद्धाश्रम’ स्थित था। यह आश्रम केवल आध्यात्मिक साधना का केंद्र नहीं था, बल्कि उच्च कोटि के दिव्यास्त्रों के संधान और सैन्य प्रशिक्षण की एक राष्ट्रीय शाला थी। ऋषि विश्वामित्र इसी भूमि से अयोध्या जाकर राजकुमार राम और लक्ष्मण को अपने साथ लाए थे। इसी करुष भूमि पर भगवान राम ने ताड़का और सुबाहु जैसी आसुरी शक्तियों का संहार कर ऋषियों के यज्ञों की रक्षा की और महर्षि विश्वामित्र से ‘बला’ और ‘अतिबला’ जैसी गुप्त विद्याओं तथा आग्नेयास्त्र, वारुणास्त्र जैसे दिव्यास्त्रों की शिक्षा प्राप्त की। इस प्रकार यह भूमि त्रेतायुग में असुर-निवारण की महावेदी बनी।
हिरण्य प्रदेश (प्राकृतिक संपदा और सामरिक किलाबंदी का केंद्र) में : वैवस्वत मन्वंतर; वर्तमान अरवल , औरंगाबाद , पटना मुंगेर के पहाड़ी क्षेत्र तथा सोन , पुनपुन विलुप्त हिरण्यबहु नदी और गंगा नदी के प्राचीन प्रवाह तंत्र के समीपवर्ती वन। विवस्वत् मनु के पुत्र राजा शरयाती , सुकन्या , च्यवन ऋषि मधुश्रवा ऋषि और्व ऋषि थे । महाभारत में इसे ‘मोदागिरि’ के नाम से पुकारा गया है। महाभारत के दिग्विजय पर्व के अनुसार, जब भीमसेन पूर्व दिशा की विजय यात्रा पर निकले थे, तब उन्होंने मोदागिरि (हिरण्य पर्वत क्षेत्र) के शक्तिशाली राजा को पराजित कर उसे मगध और अंग के अधीन किया था। यह क्षेत्र सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि इसकी पहाड़ी श्रृंखलाएं मगध को पूर्व से होने वाले आक्रमणों से बचाती थीं। बाद में यह क्षेत्र अंगराज कर्ण के प्रशासनिक और आर्थिक नियंत्रण में रहा।ऋषि मुद्गल। सनातन मान्यताओं के अनुसार, ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा ऋषि मुद्गल ने गंगा के तट पर स्थित इन सुरम्य पहाड़ियों में निवास कर कठोर तपस्या की थी। इन्हीं मुद्गल ऋषि के नाम पर इस क्षेत्र का नाम कालांतर में ‘मुद्गलगिरि’ और अपभ्रंश होकर ‘मुंगेर’ हुआ। माता सीता ने भी अग्निपरीक्षा के पश्चात इसी क्षेत्र में कष्टहरणी घाट के समीप ऋषि मुद्गल के आश्रम में कुछ समय व्यतीत किया था।‘हिरण्य’ शब्द का अर्थ सोना या मूल्यवान धातु भी होता है। यह प्रदेश अपने प्रचुर खनिजों, अस्त्र-शस्त्र निर्माण की पारंपरिक धातुकला और गंगा नदी के प्रवाह के कारण आर्थिक और सामरिक दृष्टि से प्राचीन साम्राज्यों का शक्ति-स्रोत था।
गया, राजगीर और पटना का पौराणिक व भौगोलिक उद्भव - प्राचीन बिहार के ये तीन नगर भारत के इतिहास की धुरी रहे हैं। इनका निर्माण, कालक्रम और नदियों के संगम पर इनकी अवस्थिति का विवरण इस प्रकार है:


┌──────────────────────────────────────────────────────────────────────────────┐
│ प्राचीन त्रिकोणीय नगर केंद्र │
├──────────────┬────────────────────────┬──────────────────────────────────────┤
│ नगर │ संस्थापक साम्राज्य │ नदी / भौगोलिक अवस्थिति │
├──────────────┼────────────────────────┼──────────────────────────────────────┤
│ राजगीर │ बृहद्रथ वंश / हर्यक वंश │ बाणगंगा, सरस्वती नाला (पंच पहाड़) │
│ गया │ गयासुर / राजा गया │ फाल्गु नदी (लीलाजन + मोहना संगम) │
│ पटना │ हर्यक वंश (उदायिन) │ गंगा, सोन, पुनपुन, गण्डक महासंगम │
└──────────────┴────────────────────────┴──────────────────────────────────────┤
1. राजगीर (गिरिव्रज / राजगृह)
राजगीर का वैभव इसकी अदम्य प्राकृतिक किलाबंदी और प्राचीन राजाओं की दूरदर्शिता का परिणाम है।


[विपुलगिरि] [वैभारगिरि]
╲ ╱
╲ राजगीर नगर ╱ <-- सरस्वती नाला / बाणगंगा नदी
╱ (प्राकृतिक दुर्ग) ╲
╱ ╲
[उदयगिरि] [रत्नगिरि]
[स्वर्णगिरि]


बृहद्रथ राजवंश: वेदों और महापुराणों (वायु पुराण) के साक्ष्यों के अनुसार, मगध के आदि राजा बृहद्रथ ने इस नगर की आधारशिला रखी थी। उनके पुत्र जरासंध ने इस नगर को ‘गिरिव्रज’ (पहाड़ियों का घेरा) के रूप में अत्यंत सुदृढ़ बनाया। जरासंध ने पहाड़ियों के ऊपर विशाल पत्थरों की प्राचीन दीवार (Cyclopean Wall) का निर्माण करवाया, जो आज भी प्राचीन स्थापत्य कला का एक जीवित आश्चर्य है। वैवस्वत मन्वंतर के उत्तरार्ध में, राजा बिम्बिसार ने पहाड़ियों के तलहटी वाले मैदानी भाग में एक नए और आधुनिक नगर का विन्यास किया, जिसे ‘राजगृह’ (राजाओं का निवास) कहा गया। राजगीर मुख्य रूप से किसी विशाल नदी के बजाय बाणगंगा (Ban Ganga) नदी और पहाड़ियों के भीतर से बहने वाले पवित्र सरस्वती (Saraswati) नाले के तट पर स्थित है। यह नगर पाँच विशाल पर्वतों—विपुलगिरि, रत्‍नगिरि, उदयगिरि, स्वर्णगिरि और वैभारगिरि—के मध्य एक अभेद्य प्राकृतिक ‘गिरिदुर्ग’ के रूप में अवस्थित था। वैभारगिरि के गर्भ से निकलने वाले गर्म जल के झरने (सप्तधारा और ब्रह्मकुंड) इसके औषधीय और आध्यात्मिक पर्यावरण को विशिष्ट बनाते थे।
गया (अन्तःसलिला फाल्गु की पावन भूमि) - गया एक भौतिक नगर होने के साथ-साथ एक महान आध्यात्मिक और ब्रह्मांडीय क्षेत्र है, जिसका निर्माण और विकास धार्मिक व्रतों और आत्मत्याग की नींव पर हुआ है। गयासुर का अमूर्त साम्राज्य: वायु पुराण के ‘गया माहात्म्य’ के अनुसार, इस क्षेत्र के निर्माता स्वयं भगवान विष्णु और परम वैष्णव असुर गयासुर हैं। गयासुर के विशाल और पवित्र शरीर पर जब ब्रह्मा जी के यज्ञ की वेदी स्थापित की गई और स्वयं भगवान विष्णु ने गदाधर रूप में अपने चरण उसकी पीठ पर रखे, तब वह संपूर्ण शिला-क्षेत्र ‘गया क्षेत्र’ के रूप में परिणत हो गया।: वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु के भाई राजा गया ने इस क्षेत्र को अपनी राजधानी बनाया और फाल्गु नदी के तट पर अनेक अश्वमेध यज्ञ किए। उनके न्यायप्रिय शासन और यज्ञों के कारण इस भूमि का नाम ‘गया’ सर्वत्र विख्यात हुआ। गया पवित्र फाल्गु नदी (Phalgu River) के तट पर स्थित है। भौगोलिक रूप से, फाल्गु नदी दो छोटी पहाड़ी नदियों—लीलाजन (Niranjana) और मोहना (Mohana)—के पवित्र संगम से उत्पन्न होती है। पुराणों में फाल्गु को माता सीता के श्राप के कारण ‘अन्तःसलिला’ (ऊपर से सूखी रेत, किंतु भीतर जल की निरंतर धारा) कहा गया है। यह नदी पितरों के तर्पण के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है क्योंकि इसके जल में कफ और पित्त का शमन करने वाले औषधीय तत्व विद्यमान हैं।
पटना (पाटलिपुत्र / कुसुमपुर / पुष्पपुर) पटना का उद्भव प्राचीन भारत की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक और सामरिक आवश्यकता के फलस्वरूप हुआ था। पाटलिपुत्र का अभेद जलदुर्ग में उतर में गंडक नदी , पश्चिम में सोन नद , पूर्व में गंगा नदी , दक्षिण में पुनपुन नदी था । अजातशत्रु का सैन्य दुर्ग (हर्यक वंश): वैशाली के वज्जि संघ को पराजित करने और गंगा नदी के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से, मगध सम्राट अजातशत्रु ने गंगा के दक्षिण तट पर स्थित ‘पाटलिग्राम’ में एक अभेद्य सैन्य छावनी (किले) का निर्माण करवाया था। इसी स्थान पर महात्मा बुद्ध ने विहार करते हुए भविष्यवाणी की थी कि यह छोटा सा ग्राम एक दिन वैश्विक वाणिज्य और राजनीति का महाकेंद्र (महानगर) बनेगा। उदायिन द्वारा राजधानी निर्माण: अजातशत्रु के उत्तराधिकारी राजा उदायिन (Udayin) ने लगभग ४६० ईसा पूर्व में मगध की राजधानी को राजगीर के पर्वतों से हटाकर इस मैदानी और नदी-संगम क्षेत्र में स्थानांतरित किया और विधिवत ‘पाटलिपुत्र’ नगर की स्थापना की। कालांतर में मौर्य वंश के सम्राट चंद्रगुप्त और अशोक ने इसे काष्ठ प्राचीर (wooden palisade) और ६४ द्वारों से सुसज्जित कर उस समय के विश्व का सबसे बड़ा और वैभवशाली महानगर बनाया, जिसकी गवाही यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में दी है। प्राचीन काल में पाटलिपुत्र संसार के सबसे विशाल और रणनीतिक नदी संगम पर स्थित था। यह गंगा (Ganga) और सोन (Son) नदी के साक्षात् महासंगम पर बसा हुआ था। इसके ठीक उत्तर में गण्डक (Gandak) नदी गंगा में मिलती थी और पूर्व की ओर से पुनपुन (Punpun) नदी का प्रवाह था। इन चार विशाल नदियों के घिरे होने के कारण प्राचीन पाटलिपुत्र एक अचल और अभेद्य ‘जलदुर्ग’ (Water Fort / Audaka Durga) था, जिसे कोई भी शत्रु सेना आसानी से भेद नहीं सकती थी। (समय के प्रवाह के साथ सोन नदी वर्तमान पटना से कुछ किलोमीटर पश्चिम दानापुर और मनेर की ओर खिसक गई है, परंतु प्राचीन काल में यह संगम वर्तमान पटना नगर के ठीक नीचे था)।
मन्वंतर, साम्राज्य एवं नगरों का ऐतिहासिक कालक्रम में सृष्टि प्रारंभ का स्वायंभुव मन्वंतर] में कीकट क्षेत्र: आदि भृगु ऋषियों की तपोभूमि (प्राकृतिक पर्यावरण) स्थल था । मिथिला: राजा निमि की देह का मंथन, 'मिथि जनक' द्वारा विदेह परंपरा की नींव स्थल था ।
: वैवस्वत मन्वंतर (वर्तमान युग) में त्रेतायुग (रामायण काल) का मिथिला: राजर्षि सीरध्वज जनक का शासन, माता सीता का प्राकट्य, याज्ञवल्क्य-गार्गी विमर् , करुष प्रदेश: महर्षि विश्वामित्र का सिद्धाश्रम (बक्सर), श्री राम द्वारा यज्ञ रक्षा। अंग देश: राजा लोमपाद का शासन, श्रृंगी ऋषि द्वारा अयोध्या हेतु पुत्रेष्टि यज्ञ। द्वापरयुग (महाभारत काल) का मगध: राजा बृहद्रथ व जरासंध द्वारा गिरिव्रज (राजगीर) का किलाबंदी निर्माण। अंग देश: महादानी कर्ण का चम्पा नगरी में राज्याभिषेक और दान-संस्कृति। हिरण्य प्रदेश (मोदागिरि) ऋषि च्यवन , मधुश्रवा ऋषि और्व ऋषि , : ऋषि मुद्गल की तपोभूमि, भीमसेन का पूर्व दिशा दिग्विजय। , महाजनपद काल (छठी शताब्दी ईसा पूर्व था । वज्जि संघ: वैशाली में राजा चेतक द्वारा विश्व के प्रथम गणतंत्र का संचालन, महावीर का जन्मस्थल , मगध साम्राज्य: राजा बिम्बिसार द्वारा राजगृह का विस्तार, बुद्ध को गया में ज्ञान प्राप्ति। पाटलिपुत्र: सम्राट अजातशत्रु द्वारा दुर्ग निर्माण और उदायिन द्वारा गंगा-सोन संगम पर थी। प्राचीन बिहार के इन सातों साम्राज्यों और तीन प्रमुख नगरों का इतिहास यह स्पष्ट करता है कि यह भूमि केवल राजाओं के युद्धों की कहानी नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना के क्रमिक विकास की महागाथा है। स्वायंभुव मन्वंतर में जिस भूमि ने प्रकृति-साधना और विदेह-दर्शन की आध्यात्मिक आधारशिला रखी, उसी भूमि ने वैवस्वत मन्वंतर में आकर उपनिषदों के ब्रह्मज्ञान, न्याय दर्शन के तर्कशास्त्र, अंग देश के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, वज्जि संघ के लोकतांत्रिक मूल्यों और मगध के अखंड साम्राज्यीय प्रशासन के रूप में संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शन किया। फाल्गु, पुनपुन , गंगा, सोन , गंगा और गण्डक , बागमती जैसी अन्तःसलिला और सदानीरा नदियों के संगमों पर बसे ये नगर आज भी भारत की सनातन पहचान के जीवंत और अमिट साक्ष्य हैं। इन लोकप्रिय पौराणिक संदर्भों के आलोक में प्राचीन बिहार का इतिहास संपूर्ण आर्यावर्त के सांस्कृतिक और राजनीतिक एकीकरण का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय सिद्ध होत
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