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रिश्तों की पकड़

रिश्तों की पकड़

संजय जैन

तेरा मेरा रिश्ता गहरा है
दिलके जज्बात गहरे है।
दूर होकर भी तेरे पास है
यही तो हमारा अंदाज है।।

आज झूकी है आँखे
मेरी तेरे लिए जो।
बहुत नम है आँखे
क्योंकि उनमें शर्म हाया है।।

दिलको पढ़ने की तुम
कोशिश बिल्कुल न करो।
काला है अगर दिल तो
उससे दूरियाँ बना लो।।

जिंदगी का तजुर्बा कुछ कहता है
अपने पराये का भेद खोलता है।
बहुत मिलते है राह चलते लोग।
पर उनमें हीरा एक ही होता है।।

तेरी मेरी दोस्ती अमर है
तेरा मेरा रिश्ता पक्का है।
चाहकर भी लोग इसे
कभी नही तोड़ पाये है।।

क्योंकि एक दूसरे पर विश्वास
हम दोनों का बहुत गहरा है।
जिसे आंधी और तूफान भी
कभी नही तोड़ पायेगें।।

अहंकार इतना ऊँचा मत रखो
की स्वयं को नीचे देख डर लगे।
इमारत इतनी ऊँची मत बनाओं
की नीचे देखकर स्वयं डर जाओं।।

जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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