भरत भूषण तिवारी प्रकरण : हत्या, आत्मरक्षा या कानून के शासन पर प्रश्नचिह्न?
लेखक : अधिवक्ता लक्ष्मण पांडेय
भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में समाजसेवी एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुखर आवाज माने जाने वाले भरत भूषण तिवारी की पुलिस कार्रवाई में हुई मृत्यु ने अनेक गंभीर प्रश्नों को जन्म दिया है। यह घटना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु का मामला नहीं है, बल्कि कानून के शासन, नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा का विषय बन गई है।
सबसे पहला प्रश्न यह है कि क्या पुलिस पदाधिकारी कानून से ऊपर हैं, अथवा स्वयं को कानून से ऊपर समझने लगे हैं? भारत का संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि इस देश में कोई भी व्यक्ति, संस्था अथवा पदाधिकारी कानून से ऊपर नहीं है। यदि कानून का पालन कराने वाली संस्था स्वयं कानून की सीमाओं का उल्लंघन करने लगे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर जनता का विश्वास कमजोर पड़ता है।
दूसरा प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में भारत में कानून का राज स्थापित है? जब कोई नागरिक संकट में पड़ता है तो उसे यह विश्वास दिलाया जाता है कि न्यायालय, संविधान और विधि उसे न्याय प्रदान करेंगे। यही विश्वास लोकतंत्र की आत्मा है। किन्तु जब किसी व्यक्ति की मृत्यु पुलिस कार्रवाई में होती है और उसके संबंध में अनेक प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं, तब स्वाभाविक रूप से जनता के मन में शंकाएं उत्पन्न होती हैं।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न भरत भूषण तिवारी की मृत्यु की वैधानिकता को लेकर है। यदि किसी पुलिस कार्रवाई को आत्मरक्षा के अधिकार के अंतर्गत उचित ठहराया जाता है, तो यह आवश्यक है कि उसके सभी तथ्य निष्पक्ष जांच के माध्यम से सामने आएं। भारतीय दंड संहिता की धारा 100 (अब भारतीय न्याय संहिता के समकक्ष प्रावधान) आत्मरक्षा के अधिकार को उस स्थिति तक विस्तारित करती है जहां जीवन पर तत्काल और वास्तविक खतरा हो। किन्तु यदि किसी व्यक्ति ने आत्मसमर्पण कर दिया हो अथवा वह अब खतरा न रहा हो, तो उसके विरुद्ध घातक बल का प्रयोग गंभीर कानूनी प्रश्न उत्पन्न करता है। ऐसी परिस्थितियों की निष्पक्ष न्यायिक जांच अत्यंत आवश्यक है।
चौथा प्रश्न लोकतंत्र के मूल अधिकारों से जुड़ा हुआ है। क्या भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितताओं या सरकारी नीतियों के विरुद्ध आवाज उठाना अपराध है? भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। लोकतंत्र में सरकार और प्रशासन की आलोचना राष्ट्रविरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का महत्वपूर्ण अंग है। यदि व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर प्रश्न खड़े होने लगें, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।
इतिहास साक्षी है कि देश में अनेक तथाकथित "एनकाउंटर" मामलों की बाद में न्यायालयों द्वारा जांच कराई गई और कई मामलों में पुलिस कार्रवाई को अवैध पाया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती, चाहे वह राज्य का कोई अधिकारी ही क्यों न हो।
दंडशास्त्र के अनुसार आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों में सुधारात्मक न्याय (Reformative Justice) को प्राथमिकता दी जाती है। किसी भी आरोपी को दोषी सिद्ध करने का अधिकार केवल न्यायालय को है। यदि पुलिस जांचकर्ता, अभियोजक और दंडदाता तीनों की भूमिका स्वयं निभाने लगे, तो न्यायिक प्रक्रिया का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
भरत भूषण तिवारी प्रकरण की सच्चाई क्या है, इसका अंतिम निर्णय निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच के बाद ही संभव है। किन्तु यह घटना हमें एक बड़े प्रश्न के सामने खड़ा करती है—क्या हम कानून के शासन वाले लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं या व्यक्तियों और संस्थाओं की शक्ति कानून से अधिक प्रभावशाली होती जा रही है?
आज आवश्यकता है कि इस प्रकरण की निष्पक्ष न्यायिक जांच हो, सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए और दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को कानून के अनुसार दंडित किया जाए। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। यही संविधान की भावना है, यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही कानून के शासन की आधारशिला है।
"जब कानून का शासन कमजोर पड़ता है, तब नागरिकों का विश्वास भी कमजोर पड़ता है; और जब विश्वास टूटता है, तब लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है।"
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