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"जब नारी का मान लुटे"

"जब नारी का मान लुटे"

(गीति-काव्य)
रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"


शर-शय्या पर भीष्म पड़े थे,
अस्ताचल की बेला थी,
प्रश्न पूछकर लौट चुके सब,
शांत हुई वह मेला थी।


रोक लिया फिर कृष्ण को उन्होंने,
एकांत मिला जब क्षण भर,
कहा- मधुसूदन! बतलाओ,
क्यों होने दिया यह युद्ध प्रखर?


मुस्काए फिर योगेश्वर,
मुख पर गहरी गंभीरता थी,
बोले-"भीष्म! यह केवल तो,
उत्तराधिकार की स्पर्धा थी।


चाहता यदि मैं, पल भर में
युद्ध वहीं रुक जाता था,
किन्तु समय का न्याय अधूरा
तब कैसे हो पाता था?


जिस दिन सभा के मध्य द्रौपदी,
अपमानित की जाती थी,
धर्म लजाता था कोने में,
अधर्म अट्टहास लगाता था।


युयुत्सु को छोड़ आर्यभूमि में
कौन विरोधी बन पाया?
लोभ, भय और मान-मोह ने
सबका विवेक हर पाया।


आप भी मौन रहे पितामह,
द्रोण भी न कुछ कह पाए थे,
कृपाचार्य भी चुप बैठे थे,
धर्म-बाण सब सोए थे।


तब मैंने संकल्प लिया था,
रोग बहुत अब गहरा है,
जीवित रहने का अधिकार नहीं,
जब समाज ही बहरा है।


कर्कट जैसे घोर रोग का
उपचार कठोर ही होता है,
कभी शल्य की पीड़ा सहकर,
ही जीवन फिर से होता है।


इस कारण ही अपनी सेना,
दुर्योधन को सौंप दी थी,
धरती का सारा भार मिटाने
रण का द्वार खोल दिया।


वरना कौन विवेकी अपनी
सेना विपक्ष चढ़ाता है?
अपने ही हाथों अपने जन को
मृत्यु-द्वार पहुँचाता है?


किन्तु अधर्म बढ़े जब सीमा से,
तब प्रलय जरूरी होता है,
सत्य-सूर्य का उदय हेतु
तम का अंत जरूरी होता है।


याद रखो, जब-जब नारी का,
सम्मान धरा पर रोता है,
जब-जब मानव मौन खड़ा हो
अन्याय देख कर सोता है।


तब-तब मैं उतरता हूं,
फिर धर्मध्वजा फहराने को,
महाभारत रच जाता है
मानवता को बचाने को।


चाहे ब्रह्मास्त्र उठाना पड़े,
चाहे रण में शौर्य दिखाना है,
मानव धर्म बचाने को
हर युग में रूप धर आना है।


जब तक जग में सत्य रहेगा, यह उद्घोष अमर रहेगा।
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