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मन्नतों के धागों में प्रिय, तेरा ही नाम बाँधा

मन्नतों के धागों में प्रिय, तेरा ही नाम बाँधा

कुमार महेंद्र
हृदय-पटल पर अंकित केवल,
रूप सलोना तुम्हारा है।
तुमसे ही आलोकित होता,
जीवन का हर किनारा है।
श्वासों की मधुरिम वीणा में,
अनुराग तुम्हारा जागा।
मन्नतों के धागों में प्रिय, तेरा ही नाम बाँधा।।


तुम्हारी मंद-मंद मुस्कानों पर,
यह चित्त निछावर हो बैठा।
तुम्हें आराध्य बनाकर अपना,
सारा जग विस्मृत कर बैठा।
तम का प्रत्येक अंश मिटा जब,
दूर हुई जीवन की बाधा।
मन्नतों के धागों में प्रिय, तेरा ही नाम बाँधा।।


न चाह चाँद-सितारों की है,
न वैभव का अभिमान मुझे।
तेरी स्नेहमयी बाहों से बढ़कर,
नहीं और वरदान मुझे।
इस अटूट नेह-बंधन का,
कभी न टूटे पावन धागा।
मन्नतों के धागों में प्रिय, तेरा ही नाम बाँधा।।


नयनों की नीरव भाषा में,
बस एक तुम्हारा वंदन है।
इस सूने जीवन-उपवन में,
प्रणय सावन का स्पंदन है।
तन-मन, प्राण समर्पित तुमको,
हर स्वप्न तुम्हीं से साधा।
मन्नतों के धागों में प्रिय, तेरा ही नाम बाँधा।।


जब-जब मन के मंदिर में,
प्रेम-दीप नव ज्योति जगाता है।
तेरी स्मृतियों का मधु बनकर,
हर पीड़ा को बहलाता है।
राधा-सी निष्कलुष प्रीति मिले,
बस इतना ही वर माँगा।
मन्नतों के धागों में प्रिय, तेरा ही नाम बाँधा।।


कुमार महेंद्र(स्वरचित मौलिक रचना)
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