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मुसलमान भारत के शासक हैं यह बात 18वीं शताब्दी ईस्वी तक कहीं किसी ने नहीं कही थी ।

मुसलमान भारत के शासक हैं यह बात 18वीं शताब्दी ईस्वी तक कहीं किसी ने नहीं कही थी ।

-प्रो रामेश्वर मिश्र पंकज
18वीं शताब्दी ईस्वी तक का कोई भी कथन कविता लेख ऐसा नहीं मिलेगा जो यह कहता हो कि मुसलमान भारत के शासक हैं ।
यह बात पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी के कुछ कर्मचारियों ने जो इंग्लैंड से आए थे यह प्रचारित किया कि हमको भारत के शासको का संरक्षण प्राप्त है और फिर नवाबों की चिट्ठियां दिखा दी कि यही भारत के असली शासक है।
क्योंकि लंदन में उनको बार-बार रोका जा रहा था कि तुम सीधे व्यापार करो नहीं तो मार कर भगा दिए जाओगे तुमको राजनीति करने की वहां कोई अनुमति नहीं है।
कंपनी मुस्लिम जागीरदारों की सहायता से ही धंधा फैला पा रही थी। यह तथ्य सर्व विदित है।
तब तक भारत में यह सर्व ज्ञात था कि मुसलमान कुछ-कुछ जगह टुकड़ों में कुछ जगीरो पर अधिकार बनाने में सफल हुए हैं तो वह भी सब जगह हिंदुओं की सहायता से ही सफल हुए हैं।परंतु साथ ही यह भी पता था कि यह लोग स्वभाव से पशुवत हैं और अचानक क्रूरता और अनाचार ,हत्याएं आदि करते हैं ।यह इनका स्वभाव है।

लूटपाट और क्रूरता पैशाचिकता उनका स्वभाव है और इस रूप में वह एक गंदे पशु की तरह व्यवहार करते हैं। यह उनका स्वभाव माना जाता था। परंतु उनको भारत का शासक कभी किसी ने नहीं कहा ।पहली बार उनको भारत का शासक प्रचारित किया ईस्ट इंडिया कंपनी वालों ने क्योंकि इंग्लैंड को बड़ी आपत्ति थी कि तुम वहां व्यापार करने गए हो और राजनीति क्यों कर रहे हो मारे जाओगे तो उन्होंने कमजोर किस्म के नवाबों की कुछ चिट्ठियाँ लेकर यह दिखाया कि हमको वहां के शासको की अनुमति प्राप्त है ।
इसके बाद फिर धीरे-धीरे उन्होंने इन्हीं कमजोर नवाबों से पत्र लेकर यह दिखाने की कोशिश की कि हम भारत में बड़ा अच्छा काम कर रहे हैं और वहां के शासक हमारा स्वागत कर रहे हैं। किसी हिंदू शासक ने कभी उनको ऐसा नहीं देखा ।
इसके बाद उन्होंने कंपनी कर्मचारियों में ही राजा राममोहन राय जैसे ऐसे लोगों को चुना जिनको गरज थी और जो बहुत ही गरीब भी थे और चरित्र से कमजोर भी थे कि वह हमारा काम करें और अंत में एक नवाब से ही लिखवा कर उसको राजा बनाकर भेजा क्योंकि लंदन में इंग्लैंड में उसी का सम्मान होता था जो यहां शासक हो।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहली बार साधारण जागीरदारों को भारत का शासक बताया और क्योंकि उनको वह मुसलमान जिनकी भारत में कोई निष्ठा नहीं बची थी वह यह सोचते थे कि हम इन से मैत्री करके देश में और फैल जाएंगे, हिंदुओं को पीट लेंगे तो उन्होंने उनको बहुत महत्व दिया और दूसरे यूरोपीय शराब और अन्य बहुत सी चीजों के प्रति उनका प्रचंड आकर्षण था और शुरू में कई अंग्रेज तथा अन्य यूरोपीय स्त्रियों को इन लोगों ने कई मुसलमान नवाबों को भोग के लिए सुलभ भी कराया ।इसके रिकॉर्ड मिल गए हैं ।तो इस तरह मुस्लिम जागीरदारों को यह अंग्रेज और अन्य यूरोपी अपने लिए काम के लगे तो उन्होंने परस्पर एक दूसरे को महत्व दिया और फिर इलियट आदि ने किस तरह से एक झूठा इतिहास रचा जिसकी कोई पुस्तक एक भी भारत में नहीं मिली ऐसी काल्पनिक पुस्तक रची गई बाबरनामा जैसी और धीरे-धीरे मुसलमान को भारत का शासक सबसे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी ने, बाद में कुछ अधिकारियों ने और उसके बाद अंग्रेजों के निम्न स्तरीय हिंदू सेवकों ने जो कि अपने को कोई कम्युनिस्ट कहता है कोई कांग्रेसी कहता है कोई अब तो हिंदुत्व वादी भी कहने लगा है इन फिरंगी सेवकों ने यह सब किस्से रचे। जब अंग्रेजों ने पहली बार किस्से रचे तो मुसलमान में जो सबसे शातिर थे उनको वह बड़ा मुफीद लगा बड़ा अनुकूल लगा और उन्होंने झट से उनका उर्दू में फारसी में कई भाषाओं में तर्जुमा कर दिया और फिर वह बताने लगे कि हां यह हमारी भी पुस्तक है ।
लेकिन पुरानी समकालीन कोई पुस्तक बाबर के समय तक की कोई भी समकालीन पुस्तक मुसलमान के बारे में भारत में सुलभ नहीं थी।बाद में जो हिंदुओं से तालमेल करके अकबर जैसे लोग रहे उनके बारे में सुलभ है लेकिन उनकी भी व्याख्या इन इरफान हबीब मंडली ने बिल्कुल उल्टी कर दी और अंग्रेज जो 1934 से पहले कभी दिल्ली आए ही नहीं थे कोलकाता के कोने में थे उनको भारत का शासक प्रचारित कर दिया और फिर दिल्ली में जो भी जागीरदार था उसको सबको भारत का शासक बता दिया ।
इस तरह एक झूठा इतिहास जो रचा गया उस से कुछ सीधे मुसलमान भी इस गुमान में आ गए कि हम कभी शासक रहे हैं।
अरे भाई तुम कभी भी भारत के शासक नहीं थे। मुसलमान को सबसे पहले फिरंगियों ने बढ़ाया और बाद में फिरंगियों के सेवक कम्युनिस्टों ने एक जाली इतिहास रचा और फिर यह लोग भी अजीब से गफलत में आ गए कि हम भारत के शासक रहे थे ।

अरे भाई अपने पुरखों से तो पूछ लेते तुम कब भारत के शासक रहे थे? तुम्हारी हैसियत कहां थी? झूठ मूठ में वह भारतके शासक कहलाए
अंग्रेजों की कृपा से और उनके कृपा पात्र गांधी जी और नेहरू जी के राजनीतिक गठबंधन से पहली बार पूरब और पश्चिम में जो बड़े हिस्से पूरी तरह मुसलमान के अधीन हुए।
इसके पहले इतने बड़े हिस्से में मुसलमान का शासन इकट्ठा एक खंड के रूप में भारत में संपूर्ण इतिहास में कभी भी नहीं था ।
छोटे-छोटे भूखंडों में राज्य थे।
तो पहली बार मुसलमान को वस्तुत : ताकत दी है अंग्रेजों ने और गांधी तथा नेहरू ने और कांग्रेसियों ने और इसके बाद कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने तथा अब कई हिंदू वादियों ने अंग्रेजों के शिष्य की तरह मुसलमान को भारत का शासक कहना और मानना जारी रखा है। तो इसमें भी रोज क्रोध क्षोभ की बात नहीं है ।
जो प्रबुद्ध और देशभक्त लोग हैं उन को विस्तृत अध्ययन करके सच्चा इतिहास सामने रखना चाहिए प्रमाणों के साथ और धीरज के साथ ।
कुछ वर्ष तक आप सत्य को सामने रखते रहेंगे तो सत्य सामने प्रतिष्ठित हो जाएगा। तब पता चलेगा कि मुसलमान भारत के शासक एक दिन को भी नहीं थे। उनको पूरब और पश्चिम में शासक तो अंग्रेजों और गांधी नेहरू ने पहली बार बनाया है और अभी भी मुसलमान को सारी शक्ति शासन कर रही पार्टियां ही दे रही हैं जिनमें भाजपा भी शामिल है। अगर शासक पार्टियों का संरक्षण, अनुचित पक्षपात पूर्ण संरक्षण न मिले तो मुसलमान की स्थिति जो वास्तविक है वह सामने आ जाएगी।

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