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ज्येष्ठ मास महात्मय {चतुर्थ अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {चतुर्थ अध्याय}

आनन्द हठीला
ऋपिलोग स्कन्दजी से बोले कि हे स्कन्दजी! ज्येष्ठमास में विशेष रूप से पञ्चाग्निसाधन नामक व्रत का 'विधान किया है और इस व्रत को कामुक लोग अच्छी तरह समस्त कामनाओं की सिद्धि के लिये करें ॥ १ ॥

जिस पञ्चाग्निसाधक व्रत के प्रभाव से गिरिजा (पार्वती) ने शैव पद को प्राप्त किया। हे स्कन्द जी ! जो आपने पञ्चाग्नि नाम से प्रसिद्ध व्रत को कहा उसका पञ्चाग्नि नाम कैसे हुआ ? और किस विधि से इस व्रत को करना चाहिये ? यह सत्र आप हमलोगो से कहिये ।। २ ।।

स्कन्द जी बोले कि हे विप्र लोग ! पूर्व समय मे जब रुद्र भगवान् ने सुखप्रद कामदेव को भस्म कर दिया तब दीनवदना पार्वती बहुत दिनों तक शोकाकुल हो गई ।। ३ ।।

बाद मे पिता के गृह में जाकर रहने लगीं परन्तु पार्वती जी को कहीं भी सुख न मिला। उस समय हिमालय के वासी ऋपियों के आश्रमो मे जाकर ।। ४ ।।

चित्त की शान्ति के अर्थ काली (पार्वती) जी ने उपाय को पूछा ॥ ५ ॥

इस तरह पार्वती जी के पूछने पर सप्तऋपियों मे भृगु नामक ऋषि बोले कि हे महाभागे ! तुम विधिपूर्वक पञ्चाग्निसाधन नामक व्रत को करो ।। ६ ।।

पार्वती जी ने कहा कि स्वामिन् ! किस विधान से इस उत्तम व्रत को करना चाहिये ? भृगु ऋषि बोले कि हे महाभागे ! तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया। मैं तुमसे विस्तार से कहता हूँ ॥ ७ ॥

ज्येष्ठ मास की तृतीया के दिन प्रातःकाल स्वच्छ जल में स्नान कर नित्यक्रिया को करे और शुक्ल वन धारण कर गृह को आवे ॥ ८ ॥

घर आकर पुण्याहवाचन कर्म को करे तथा ब्राह्मणों का पूजन करे। समिधाओं से प्रदीप्त चार अग्नि को करके यथाशक्ति उन अग्नियों का पूजन करे ॥ ६ ॥

और उन अग्नियों के मध्य भाग में बैठकर सूर्यनारायण के तरफ अपनी दृष्टि को रखे तथा 'जब तक सूर्यनारायण अस्त न होवें तब तक इन्द्रियों को वरा मे कर स्थित रहे ॥ १० ॥

इस तरह निराहार जितेन्द्रिय रहकर मासव्रत को करे। भृगु ऋषि के इस वचन को सुनकर सती उमादेवी प्रसन्न हो गई ॥ ११ ॥

और भृगु ऋषि के कथनानुसार विधि से श्रीशिवजी के प्रसन्नार्थ बारह (१२) वर्ष तक उमा ने इस व्रत को प्रत्येक मास मेकिया ॥ १२ ॥

तथा इस व्रत के प्रभाव से शिवजी भी मुग्ध हो गये और पार्वती जी कहाँ गई? इस विचार में पड़कर समाधि के द्वारा उमा देवी का तपोवन में होना निश्चय कर ।। १३ ।।

स्वयं भी वनचरों का स्वरूप बनाकर उमा देवी के तपोवन को गये तथा विविध प्रकार के अमृत समान वचनों से समझाया ॥ १४ ॥

हे विप्र लोग ! समझाने पर जब पार्वती जी ने वनचर रूपधारी शङ्कर भगवान् को भटकार दिया तब उस समय श्रीशिव जी ने अपने को प्रकट कर दिया। और पार्वती जी ने जब शङ्कर भगवान् को देखा तब लज्जा से सिर नीचा कर लिया ॥१५॥

भगवान् शिव जी ने हर्ष से पार्वती जी को अपने गोद में करके आलिङ्गन किया। इस समाचार के मिलने पर हिमवान् भी श्रीशिवजी के पास आये ॥ १६ ॥

और आकर अनेक विविध उपचारों से पूजन किया ।' श्रीशिव जी हिमवान्तथा उस तपोवन के वासियों की आज्ञा लेकर ॥ १७ ॥

पार्वती जी को अपने अर्धाङ्ग में धारण कर कैलास पर्वत को चले गये। हे विप्र लोग! मैंने आपलोगों से इस पञ्चाग्नि साधन व्रत को कहा है ॥ १८ ॥

और ज्येष्ठ मास का पुनः क्या माहात्म्य सुनना चाहते है। यह व्रत सभी अर्थों का साधक है पहिले बहुतों ने इस व्रत को किया है। तथा यहं व्रत धर्म अर्थ काम और मोक्ष का श्रेष्ठ साधक माना गया है ॥ १६ ॥

जो लोग इस व्रत को श्री जगदीश की तुष्टि तथा पुष्टि के लिये करते हैं वे लोग इस लोक मे विविध प्रकार के समस्त इष्ट काम भोगों को भोग कर अन्त में उस परब्रह्म के उत्तम लोक को जाते है ।।२०।।

इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भापाटीकायां चतुर्थोऽध्यायः ॥

क्रमशः...
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