ज्येष्ठ मास महात्मय {तेईसवां अध्याय}

आनन्द हठीला
स्कन्दजी ऋषियों से बोले और वेदव्यासजी राजा युधिष्ठिर से बोले कि हे राजन् ! हे युधिष्ठिर ! श्रेष्ठ स्त्रियों का महाभाग्य वर्णन करूंगा। और राजकन्या सावित्री ने जिस तरह समस्त वस्तुओं को प्राप्त किया उसको आप श्रवण करे ॥ १ ॥
मद्रदेश में परम धार्मिक धर्मात्मा राजा रहता था वह ब्रह्मण्य, शरणागत का रक्षक, सत्यप्रतिज्ञ, जिते-न्द्रिय ॥ २ ॥
यज्ञ करने वाला, दानपति, शूर और पुरवासी देशवासी जनों का प्रिय था तथा समस्त प्राणियो के हित में रत, पृथिवीश्वर अश्वपति नाम से विख्यात था ॥ ३ ॥
राजा अश्वपति क्षमाशील, सत्यवक्ता, जितेन्द्रिय और सन्तानहीन था । अधिक अवस्था हो जाने पर भी उसको सन्तति न हुई ॥ ४ ॥
अश्वपति राजा ने सन्तान के लिये नियम ग्रहण कर समय पर परिमित भोजन, ब्रह्मचयेव्रत का पालन, इन्द्रिय निग्रह कर ॥ ५ ॥
एक लक्ष आहुति सावित्री मन्त्र से देकर पष्ठ काल में अमित (इच्छा पूर्वक) भोजन करता था ।॥ ६ ॥
इस तरह नियम पालन करते राजा अश्वपति को अठारह (१८) वर्ष बीत गया। अठारह वर्ष पूर्ण होने पर सावित्री प्रसन्न हुई ॥ ७ ॥
हे राजन् ! और अग्निहोत्र से प्रकट होकर राजा को रूपवती सावित्री ने दर्शन दिया ॥ ८ ॥
तथा वर देने के निमित्त राजा अश्वपति से बोली । सावित्री ने कहा कि हे पार्थिव ! तुम्हारे ब्रह्मचर्य, शुद्धता, नियम, इन्द्रियदमन ॥ ९ ॥
सर्वात्म-समर्पण और भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ । हे मद्रराज ! हे अश्वपते ! तुम मुझ से इच्छित वर को कहो ॥ १० ॥
तुमने धर्म के विषय में किसी तरह कुछ भी प्रमाद नहीं किया। राजा अश्वपति बोले कि हे देवि ! मैंने धर्मप्राप्ति की इच्छा से अपत्य के लिये सभ किया है ॥ ११ ॥
आप मुझे बहुत पुत्र दें और वे पुत्र कुल को पवित्र करने वाले हों। हे देवि ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न है तो मैं आपसे इस कामना को चाहता हूँ ॥ १२ ॥
हे देवि ! ब्राह्मणों ने मुझ में कहा है कि सन्तान होना श्रेष्ठ धर्म है। सावित्री बोली कि हे राजन् ! मैने पूर्व में ही तुम्हारे इस अभिप्राय को जानकर पुत्र के लिये ब्रह्मा से कहा। हे सौम्य ! ब्रह्मा के प्रसाद मे तेजस्विनी कन्या शीघ्र ही तुमको होगी। हे राजन् ! अब इस विषय में तुम मुझ से कुछ भी न कहना ॥ १३-१५ ॥
ब्रह्मा की आज्ञा में प्रसन्न होकर में तुममे यह कहती हू। सावित्री के वचन को सुनकर राजा अश्वपति बोले कि हे देवि ! ब्रह्मा ने जो कुछ कहा है वह मुझे स्वीकार है, यह कहकर सावित्री को पुनः प्रसन्न किया । तत्र सावित्री देवी ने कहा कि हे राजन् ! यह शीघ्र होगा, कह कर सावित्री अन्तर्हित हो गई। राजा अश्वपति पुनः अपने घर आया ॥ १६-१७ ॥
और राज्यासन पर बैठकर प्रसन्न मन से धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करने लगा। कुछ समय बीतने के बाद व्रत मे तत्त्पर राजा अश्वपति ने ॥ १८ ॥
अपनी धर्मचारिणी ज्येष्ठ महिषी में गर्भाधान किया। हे भरतर्षभ ! उस राजपुत्री मे गर्भ क्रमशः आकाश में शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान बढ़ने लगा। प्रसवकाल के आने पर राजमहिपी ने कमललोचना कन्या को पैदा किया ॥१९-२०॥
राजा अश्वपति ने उस कन्या का जातकर्मादि सत्र संस्कार किया और सावित्री ने प्रेम से इसका प्रदान किया तथा सावित्री की एक लक्ष आहुति करने से प्राप्त हुई ॥ २१ ॥
इसलिये उस कन्या का ब्राह्मणों ने तथा राजा अश्वपति ने सावित्री नाम रखा। वह राजकन्या शरीरधारी लक्ष्मी के समान बढने लगी ।॥ २२ ॥
समय पाकर जब वह कन्यवा युवती हुई तब उस सुमध्यमा, सुश्रोणी को सुवर्णप्रतिमा के समान देख कर ॥ २३ ॥
राजा को यह देवकन्या मिली है, यह लोगों ने निश्चय किया। उस कमलपत्र के समान नेत्रवाली कन्या को स्वतेज से जलती हुई अग्नि के समान तेजस्विनी देखकर ॥ २४ ॥
उसके तेज से बाधित होकर उसे किसी ने नहीं वरा। तदनन्तर कन्या ने उपवास कर शिर से स्नान किया और देवता के समीप जाकर ॥ २५ ॥
विधिवत् अग्नि में आहुति दिया, पव में ब्राह्मणो से प्रवचन कराया और प्रसन्नचेता उन महात्मा ब्राह्मणो का पूजन किया ॥ २६ ॥
तदनन्तर लक्ष्मी के समान रूपवती वह राजकन्या पिता के पास गई और पिता के चरणों को अभिवादन कर शेष सूत्र समाचार कहा ॥ २७ ॥
वह वरारोहा राजकन्या हाथ जोड़कर राजा के पास खडी हो गई। देवरूपिणी उस अपनी कन्या को युवावस्था मे देखकर ॥ २८ ॥
जिस कन्या को कोई वर नहो मॉग रहा हैं उसे देखकर राजा अरवपति दुःखी हो गया और अपनी कन्या से बोला कि हे पुत्रि! यह तुम्हारे प्रदान (दान) का समय है परन्तु तुमको कोई मॉगता नहीं ह ॥ २९ ॥
इसलिये तुम स्वयं अपने गुणों के समान पति का खोज करो और जो प्रसिद्ध पुरुप हो उसको मुझसे कहो ॥ ३० ॥
विचार कर हम तुम्हारा प्रदान करेंगे। तुम जैसा पति चाहती हो वैसा वरो । ब्राह्मणो से पढ़ा जाता हुआ इस तरह का वर धर्मशास्त्रों मे सुना है ॥ ३१ ॥
हे कल्याणि ! मेरे वचन को सुनकर वैसा तुम भी करो। समय में विवाह न करने पर पिता को कन्या कहे कि मेरा विवाह कर दीजिये और पति से कुछ कहना हो तो नम्रता पूर्वक (प्रार्थना पूर्वक) कहे ॥ ३२ ॥
तथा पति के न रहने पर और माता से अरक्षित होने पर पुत्र से कहे। इस बात को सुनकर तुम पति के अन्वेषण मे जाओ ।॥ ३३ ॥
जिसमे हम देवताओं के निगाह मे निन्दनीय न हो जांय वैसा तुम करो । स्कन्दजी बोले कि हे ऋषि लोग ! इस तरह राजा अश्वपति ने कन्या और वृद्ध राजमन्त्रियों से हित वचन कहा ॥ ३४ ॥
और राजकन्या के साथ अनुगमन के लिये मन्त्रियो को आज्ञा दी। तदनन्तर तपस्विनी वह राज-कन्या लजित होकर पिता के चरणों को प्रणाम कर ॥ ३५ ॥
विना विचार किये पिता की आज्ञा मानकर रथ पर सवार होकर वृद्ध मन्त्रियों के साथ घर से पति के खोज मे चली ।। ३६ ।।
वह राजकन्या राजर्षियो के सुन्दर तपोवन को गई, वहां पर माननीय तपोवृद्ध लोगों के चरणों को प्रणाम कर ॥ ३७ ॥
क्रम से समस्त वनों को गई हे नृपात्मज ! इस तरह वह समस्त तीर्थों में भी गई ॥ ३८ ॥
और जो ब्राह्मण-श्रेष्ठो का वन था उसका त्याग कर समस्त देशों को गई ॥ ३६ ॥
इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भापाटीकायां त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
क्रमशः...〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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