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क्या फिर लौटेगा राजनीति की वो तस्वीर जिससे समाज ने दूरी बना ली थी?

क्या फिर लौटेगा राजनीति की वो तस्वीर जिससे समाज ने दूरी बना ली थी?

दिव्य रश्मि के उपसंपादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह रही है कि उसने समय-समय पर स्वयं को बदला, सुधारा और नई परिस्थितियों के अनुरूप ढाला। यही कारण है कि अनेक उतार-चढ़ावों के बावजूद लोकतंत्र की जड़ें लगातार मजबूत होती गई। लेकिन राजनीति का सफर हमेशा इतना सहज नहीं रहा। आज से दो दशक पहले का राजनीतिक परिदृश्य याद करें तो एक ऐसी तस्वीर सामने आती है जिसमें राजनीति को समाज के सभ्रांत वर्ग का पसंदीदा क्षेत्र नहीं माना जाता था। राजनीति में प्रवेश करना या उससे जुड़ना कई बार सामाजिक प्रतिष्ठा के विरुद्ध समझा जाता था। शिक्षित और प्रतिष्ठित लोग इससे दूरी बनाए रखने में ही अपनी भलाई समझते थे। उस दौर की राजनीति में तुष्टिकरण, भ्रष्टाचार, अस्थिरता, अपराधीकरण, हिंसक चुनाव और बाहुबल की ऐसी छाया थी जिसने लोकतंत्र के आदर्श स्वरूप को काफी हद तक प्रभावित किया। चुनाव जीतना ही अंतिम लक्ष्य बन गया था और इसके लिए साधनों की शुचिता पर कम ध्यान दिया जाता था। परंतु समय बदला, चुनाव प्रणाली बदली, तकनीक आई और लोकतंत्र के स्वरूप में भी परिवर्तन दिखाई देने लगा। मगर प्रश्न यह है कि क्या आज वास्तव में राजनीति पूरी तरह बदल गई है? और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वर्तमान परिस्थितियां कहीं हमें फिर उसी पुराने रास्ते की ओर तो नहीं ले जा रहीं?


लगभग दो दशक पहले राजनीति के प्रति समाज का दृष्टिकोण काफी नकारात्मक था। यदि किसी परिवार में कोई युवा राजनीति में जाने की इच्छा व्यक्त करता था तो अक्सर परिवारजन उसे रोकते थे। कारण साफ था, राजनीति को आदर्शवाद नहीं बल्कि अवसरवाद और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम माना जाने लगा था। राजनीति में ऐसे चेहरों की संख्या बढ़ रही थी जिनकी पहचान जनसेवा से अधिक आपराधिक छवि के कारण थी। चुनावी प्रक्रिया में धनबल और बाहुबल का बोलबाला था। कई क्षेत्रों में मतदान के दिन भय का वातावरण रहता था। बूथ कब्जाने, मतपत्र लूटने और हिंसक घटनाओं की खबरें आम थी। ऐसे माहौल में स्वाभाविक था कि शिक्षित वर्ग और सभ्रांत समाज राजनीति से दूरी बनाए। उन्हें लगता था कि यह ऐसा क्षेत्र बन गया है जहां सिद्धांत और मूल्य पीछे छूट चुके हैं।


भारतीय चुनाव प्रणाली के इतिहास में मतपत्र से चुनाव का लंबा दौर रहा। उस समय चुनावी प्रक्रिया में कई कमजोरियां थी। मतदान केंद्रों पर फर्जी मतदान, मतपत्रों की लूट, बूथ कैप्चरिंग और मतगणना में गड़बड़ी जैसी शिकायतें अक्सर सामने आती थी। चुनाव जीतने के लिए संगठित तरीके से मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने के प्रयास किए जाते थे। चुनावों के दौरान हिंसा की घटनाएं लोकतंत्र पर प्रश्नचिह्न लगाती थी। मतपत्र व्यवस्था में मानवीय हस्तक्षेप अधिक था और उसी अनुपात में विवादों की संभावना भी रहती थी। लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक था।


समय के साथ भारतीय चुनाव आयोग ने चुनाव प्रणाली में बड़े सुधार किए। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के उपयोग ने चुनाव प्रक्रिया को नई दिशा दी। इस परिवर्तन का प्रभाव केवल तकनीकी नहीं था, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक भी था। मतदान प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और तेज हुई। बूथ कब्जाने जैसी घटनाओं में कमी आई। मतगणना सरल हुई और परिणाम शीघ्र आने लगे। इसके साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई। चुनाव आयोग ने निगरानी तंत्र को भी प्रभावी बनाया। इससे चुनावों के दौरान अपराधी गतिविधियों पर अंकुश लगा। हालांकि चुनावी सुधारों का पूरा श्रेय केवल तकनीक को देना उचित नहीं होगा। प्रशासनिक इच्छाशक्ति, चुनाव आयोग की सक्रियता और समाज की जागरूकता ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


जब चुनाव प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बढ़ा तो मतदान प्रतिशत में भी सुधार दिखाई देने लगा। पहले जो लोग यह सोचकर मतदान से दूरी बनाते थे कि उनके वोट का कोई महत्व नहीं है, वे भी मतदान केंद्र तक पहुंचने लगे। लोकतंत्र की शक्ति तभी मजबूत होती है जब आम नागरिक उसमें सक्रिय भागीदारी करे। बढ़ता मतदान प्रतिशत इस बात का संकेत था कि जनता की लोकतंत्र में आस्था मजबूत हो रही है। इसके परिणामस्वरूप राजनीतिक स्थिरता भी बढ़ी। पहले गठबंधन सरकारों के दौर में अस्थिरता अधिक दिखाई देती थी। सरकारें बनती और टूटती थी। लेकिन धीरे-धीरे जनादेश अधिक स्पष्ट होने लगे।


राजनीतिक विमर्श में तुष्टिकरण लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। पहले आरोप लगाया जाता था कि राजनीति एक विशेष वर्ग को ध्यान में रखकर संचालित होती है। अनेक दलों पर वोट बैंक की राजनीति करने के आरोप लगते थे। समय के साथ परिस्थितियां बदली। अब राजनीति में केवल अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक समूहों को साधने की रणनीतियां बनने लगी अर्थात तुष्टिकरण की प्रवृत्ति समाप्त नहीं हुई बल्कि उसका स्वरूप बदल गया। पहले जो एकतरफा दिखाई देता था, अब वह कई दिशाओं में फैलता दिखाई देता है। लोकतंत्र में हर वर्ग की चिंता करना आवश्यक है, लेकिन यदि नीतियां केवल चुनावी गणित के आधार पर बनने लगे तो दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित प्रभावित हो सकते हैं।


एक समय था जब नेताओं की भाषा और आचरण पर सवाल उठते थे तो समाज खुलकर प्रतिक्रिया देता था। अमर्यादित बयान, व्यक्तिगत हमले और राजनीतिक स्तरहीनता को आलोचना का सामना करना पड़ता था। लेकिन वर्तमान समय में एक विचित्र परिवर्तन दिखाई देता है। राजनीतिक भाषा का स्तर कई बार गिरता है, लेकिन समाज का बड़ा वर्ग उसे सामान्य मानकर स्वीकार कर लेता है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ाया है। पहले राजनीतिक बहस सीमित मंचों तक होती थी। अब हर व्यक्ति स्वयं एक मंच बन चुका है। परिणामस्वरूप राजनीतिक कटुता केवल नेताओं तक सीमित नहीं रही बल्कि समर्थकों तक भी पहुंच गई। स्थिति यह हो गई कि विरोध अब वैचारिक कम और व्यक्तिगत अधिक दिखाई देता है।


लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जनादेश का सम्मान। लेकिन हाल के वर्षों में एक नई प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। जब चुनाव परिणाम अनुकूल आते हैं तो पूरी प्रक्रिया पर विश्वास व्यक्त किया जाता है, लेकिन जब परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं होते तब चुनाव प्रणाली पर प्रश्न उठने लगते हैं। यह केवल भारत तक सीमित नहीं है बल्कि विश्व के कई लोकतंत्रों में दिखाई देने वाली प्रवृत्ति है। यदि राजनीतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता तय करने लगे तो यह खतरनाक संकेत हो सकता है। संस्थाओं की आलोचना होना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन निरंतर अविश्वास पैदा करना लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर कर सकता है।


कुछ राजनीतिक दल समय-समय पर मतपत्र आधारित चुनाव प्रणाली की वापसी की मांग करते रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी। वहीं दूसरी ओर यह भी तर्क दिया जाता है कि इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली ने चुनावी हिंसा और गड़बड़ियों में कमी लाई है। यह विषय केवल राजनीतिक बहस नहीं है बल्कि तकनीकी और प्रशासनिक विमर्श का भी हिस्सा है। प्रश्न यह नहीं है कि मतपत्र बेहतर था या मशीन। असली प्रश्न यह है कि चुनाव प्रणाली ऐसी हो जिस पर जनता का अधिकतम विश्वास कायम रहे।


कोई भी लोकतंत्र केवल संविधान या संस्थाओं से मजबूत नहीं होता है। उसकी सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है। यदि जनता को लगे कि उसकी भागीदारी सार्थक है, उसका मत सुरक्षित है और उसकी आवाज का महत्व है, तभी लोकतंत्र मजबूत रहेगा। राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी केवल चुनाव जीतना नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास बनाए रखना भी है।


यह आशंका पूरी तरह निराधार नहीं है कि यदि राजनीतिक संवाद लगातार कटु और अविश्वास आधारित होता गया तो समाज फिर राजनीति से दूरी बना सकता है। यदि हर चुनाव के बाद संस्थाओं पर प्रश्न उठने लगें, यदि हर पराजय के बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर संदेह हो और यदि राजनीतिक लाभ के लिए समाज में विभाजन की रेखाएं और गहरी की जाएं, तो परिस्थितियां चिंताजनक हो सकती हैं। इतिहास बताता है कि लोकतंत्र की संस्थाएं अचानक कमजोर नहीं होती। धीरे-धीरे उनमें अविश्वास बढ़ता है और फिर समाज उनसे दूरी बनाने लगता है।


भारत ने लंबे संघर्ष के बाद एक मजबूत लोकतांत्रिक पहचान बनाई है। चुनाव प्रणाली में सुधार, बढ़ती जागरूकता और राजनीतिक भागीदारी ने लोकतंत्र को नई मजबूती दी है। लेकिन सुधार की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती। लोकतंत्र को केवल मतदान तक सीमित नहीं रखना होगा। राजनीतिक मर्यादा, वैचारिक संवाद, संस्थाओं के प्रति सम्मान और जनविश्वास भी उतने ही आवश्यक हैं। राजनीति तभी स्वस्थ मानी जाएगी जब जीत और हार दोनों परिस्थितियों में लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान किया जाए अन्यथा जिस राजनीति से समाज कभी दूरी बना चुका था, उसके लौटने की आशंका को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता है और यदि ऐसा हुआ तो सबसे बड़ा नुकसान किसी दल या नेता का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का होगा।


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