डॉ. मेधाव्रत शर्मा, डी•लिट•
(पूर्व यू.प्रोफेसर)
साहब का रुतबा अजब, देखिए।
खब्ती दरिंदों में रब देखिए ।
जब्रन चिपकते हुए इससे-उससे,
विदेशों में साहब का ढब,देखिए।
भगतों को बरबस नचाए रिझाए,
कलंदर का डमरू गजब,देखिए।
जाने न पाए इनाने हुकूमत,
साहब का जाली अदब,देखिए।
आसाँ जहाँ है शबाबो कवाब,
साहब का सैरे अरब,देखिए।
भरम टूटने पर न लटका के मारे,
शाही का असली सबब ,देखिए।
ऐलान खुद को है करता पयंबर,
मिराकी का जलवा अजब,देखिए।
गारत हो भारत,जरर कुछ नहीं,
शहंशाह को लब-ब-लब,देखिए।
मुंसिफी की जुबाँ तिलचटी हो गई,
हद्द नैतिक पतन की तो अब,देखिए।
(मिराकी =पागल। जरर=हानि।इनाने हुकूमत =शासन की बागडोर।
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