तोड़ने पर अक्सर टूट जाता हूँ,
बेहया दूब सा फिर जम जाता हूँ।आदतें कुछ कुछ नर्म घास जैसी,
आँधियों के तेवरों से बच जाता हूँ।
देखा टूटते वृक्ष अकड़ कर खड़े जो,
विनम्रता के कारण सँभल जाता हूँ।
अहंकार की गर्मी झुलसते बहुत से,
उपलब्धियाँ आभार बता जाता हूँ।
है चाहत तुलसी सा गुणकारी बनूँ,
जिसने पहचाना वहाँ पूजा जाता हूँ।
फितरत कड़वी रखता हूँ नीम जैसी,
उपयोगी मगर सच समझा जाता हूँ।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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