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ज्येष्ठ मास महात्मय {उन्नीसवां अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {उन्नीसवां अध्याय}

आनन्द हठीला
व्यासजी बोले कि हे भीमसेन ! उस ग्रामवासी के इन वचनों को सुनकर क्रुद्ध वह राजा पुलिन्द गर्वयुक्त होकर वचन बोला ॥ १ ॥

ए ग्रामवासी ! यह एकादशी कौन है ? इस दिन कौन व्रत किया जाता है? हे मूढ़ ! तू निष्फल बात को क्यों कहता है। तू अपने घर सकुशल चला जा ॥ २ ॥

नहीं तो ये परम दारुण दूत तुझको पीटेंगे । तदनन्तर वे सत्र सैनिक नगर में घुस गये ॥ ३ ॥

और बड़े २ महात्मा महाजनों के गृह के किवाड़ फाटक वगैरह तोड़कर सभी गृहों से धनकोश धीरे धीरे ले गये ॥ ४ ॥

उसी तरह धनिकों के गृह से श्रेष्ठ धनों को ले गये। इस तरह समस्त नगर के गृह भयानक सैनिकों से भर गया ॥ ५ ॥

उस दिन पुरवासियों को कन्द मूल फल वगैरह कुछ भी न मिला और समस्त पुरवासियों का जल रहित (निर्जल) एकादशी का व्रत हा गया ॥ ६ ॥

सूर्यनारायण 'अस्त हो गये और नगर के बालकों को जल तक नहीं मिला। इस तरह उस एक ही नगर में बड़ा हाहाकार होने लगा ॥७॥


स्वर्ग में भगवान् विष्णु यह देखकर चकित हो गये, और फणीन्द्र (शेष) पर स्थित विष्णु भगवान् उस समय संभ्रान्त के समान उठकर खड़े हो गये ॥ ८ ॥


तथा गरुड़जी को बुलाकर उनके कान में सभी बातें कह दीं और गरुड़जी की सवारी कर शीघ्र उस नगर को गये तथा वहाँ जाकर विविध प्रकार की सेना का निर्माण किया ॥ ६ ॥


जिस सेना के सैनिक तीन नेत्र, सात जिह्वा (जीभ), चार पैर, महान् अद्भुत, बड़े २ दाँत, तीन शिर, दो मुख, दश मुख ॥ १० ॥


छ (६) मुख, पाँच मुख, हाथी के समान मुख, हाथी के समान आकृति (स्वरूप), सिंह के समान आकृति, महान् भयायक, नृसिंह के समान तेजस्वी ॥ ११ ॥


सिन्दूर से पूजित मुख, महिषासुर के समान, कराल, विकराल, नीलपर्वत के समान प्रभायुक्त ॥ १२ ॥


ऊध्यकेश, दिगम्बर, नरमुण्डधारी, ऑतों की माला से युक्त, व्याघ्र चर्मधारी थे ॥ १३ ॥


इसके पूर्व मनुष्यों से अदृष्ट (नहीं देखी गई ऐसी सेना को विभु (व्यापक) विष्णु भगवान् ने आज्ञा दी कि नृपो मे अधम इस सेना सहित पुलिन्द का मेरी आज्ञा से ॥ १४ ॥


सूर्योदय के पूर्व अच्छी तरह नाश करो। विष्णु भगवान् की आज्ञा को शिर से धारण कर वे विष्णु के सैनिक दल शत्रु सैनिकों में घुस गये ॥ १५ ॥


और शस्त्र प्रहार कर वध करने लगे जिससे बड़ा कोलाहल मच गया। कुछ खड्ग से मारे गये, कुछ खट्वाङ्ग से वध किये गये ॥ १६ ॥


औरे कुछ दंशन से दंशित किये गये तथा अन्य लोगों को कुछ लोग भक्षण कर गये और जो वीर लोग भाग रहे थे उनके पैर पकड़ कर पृथिवी पर गिरा दिये गये ॥ १७ ॥


इस तरह पैदल सेना बीर मार डाले और बहुतों को खा गये । रथी, घोडसवार, घोडा वगैरह अत्यन्त दंशन के द्वारा चूर्ण कर दिये गये ॥ १८ ॥


शिबिर में आग लगाकर भस्म कर दिये, तब उसका बड़ा प्रकाश हुआ उस प्रकाश को देखकर सब विस्मय करने लगे और बोले कि तुम लोग कौन हो? और कहाँ से आये हो ? ॥१६॥


उन लोगो ने इस तरह के वीरो को कहींपर भी नहीं देखा था । अतः उनको मनुष्य न समझ कर सब सैनिक वहाँ से भागने लगे ॥ २० ॥


उनको भागते देखकर उनका पीछा कर मार डाला। इस तरह उस पुलिन्द के समस्त सैनिको को मार डाला ॥ २१ ॥


बाद विष्णु गणों के साथ युद्ध करने के लिये राजा पुलिन्द भी गया और शस्त्र अस्त्र के दारुण प्रहार से आधा प्रहर तक युद्ध किया ॥ २२ ॥


जब उनके साथ युद्ध करने में समर्थ न हुआ तब वह मन मे विचार करने लगा कि हम अब यहाँ से भाग जायें और ये सब यहाँ अवश्य नष्ट हो जायेंगे ॥ २३ ॥


मन मे निश्चय कर पुलिन्द ने मेघास्त्र को छोड़ा, जिस मेघास्त्र के द्वारा वहाँ घोर अन्धकार हो गया और मेघ लोग जल वर्षाने लगे ॥ २४ ॥


तथा प्रचण्ड पचन बहने लगा। उस समय सब मुग्ध हो गये और जहाँ जो था वहाँ कार्य छोड़कर चुपचाप बैठ. गये ।। २५ ।।


घोड़ा परं सवार होकर पुलिन्द एकाकी अफ्ने पुर को चला गया। और कुछ शेप सैनिक भो पुलिन्द के जाने के बाद चले गये ॥ २६ ॥


भक्तवत्सल विष्णु भगवान् भक्त का कार्य कर अपने लोक को चले गये । प्रातःकाल उठकर नगरवासी आश्चर्य करने लगे ॥ २७ ॥


वहाँ पर शत्रु की सेना न देखकर आखीर में उन लोगों ने निश्चय कर उसे स्वप्न माना और भगवत्श्रिय स्नानादि कर्म किया ॥ २८ ॥


तथा पारण के अन्त में वाहर आकर उस महान् कौतुक को देखा कि संग्राम के मैदान में अनेकों प्रेत गिरे है ॥ २९ ॥


इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भाषाटीकायां उनविंशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
क्रमशः...

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