सपने विखरे
संजय जैनदिल तो लूट लिया मेरा
मन का लूटना बाकी है।
आसमान में उड़ते पंक्षीयों का
जमीन पर आना बाकी है।।
ख्व़ाब अधूरे बहुत है मेरे
जिसको साकार करना है।
ऊँची उड़ानों को भरने की
हिम्मत हमको करना है।।
दिन में रात में देखे सपने
क्या पूरा कर पाऊंगा।
अपने जीवन के संघर्ष को
क्या हम कम कर पाएंगे।।
बहुत खो दिया जीवन अपना
सपने पूरा करने में।
पर अब तो कमर टूट गई
सब का बोझा ढोने में।।
उम्र लगा दी हमें अपनी
सबको खुश करने में।
पर खुश कर नही पाया
घर परिवार के लोगों को।।
आज हालत बहुत बुरी है
जिसकी कल्पना की नही थी।
खुदके बच्चों ने ही मुझको
जीते जी ही मार दिया।।
खुदकी कमाई का उपयोग
खुद में कर सकता नही।
क्योंकि जीवन की एक गलती ने
हाल जो मेरा बुरा किया।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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