नारी की महत्ता
अरुण दिव्यांशएक नारी संभाल न पाया ,
दूजी नारी तुम ढूॅंढ़ रहे हो ।
इक नारी किए अपमानित ,
दूजी से क्यों कुढ़ रहे हो ।।
इक नारी के कब्जे में रहते ,
इक नारी का करे अपमान ।
जिस नारी ने जन्म दिया है ,
नहीं सिखाया देना सम्मान ।।
सम्मान देना सीखा नहीं या ,
कब्जे में आकर भूल गए ।
इक नारी माॅं को तू तजकर ,
दूजी पत्नी में ही झूल गए ।।
एक नारी वह भी होती जो ,
जन्म देनेवाली महतारी है ।
दूजी नारी वह भी होती जो ,
पत्नी बन गई तुम्हारी है ।।
एक नारी की कदम चुमते ,
दूसरी पहुॅंचती वृद्धाश्रम है ।
दूजी नारी जो पत्नी तुम्हारी ,
तुम्हें फहुॅंचाती नर्काश्रम है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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