Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

ज्येष्ठ मास महात्मय {सत्रहवां अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {सत्रहवां अध्याय}

आनन्द हठीला
स्कन्द जी ऋषियों से बोले और वेदव्यास जी राजा युधिष्ठिर से बोले कि हे नृपश्रेष्ठ ! ज्येष्ठमास के शुक्लपक्ष मे एकादशी का व्रत होता है, उस दिन मनुष्य निर्जल उपवास कर शर्करा (चीनी) सहित जल से पूर्ण घट का ॥ १ ॥

दान श्रेष्ठ त्राह्मणों को देकर विष्णुलोक में जाकर आनन्द करता है। युधिष्ठिर वेदव्यास जी से बोले कि हे द्वौ पायन ! मैंने मानव धर्म (स्मृति धर्म) और वैदिक धर्मों को सुना है ॥ २॥

हे व्यास जी ! अब आप वैष्णव-धर्मों को कहिये । वेदव्यास जी बोले कि हे राजन् ! आपने मानव धर्म और वैदिक धर्मों को सुना है ॥ ३ ॥

हे नराधिप । वे सब मानव तथा वैदिक धर्म कलियुग में अशक्य (शक्ति से असाध्य) है। इसलिये सुख से करने योग्य, थोड़ा खर्च, अन्प क्लेश, महान् फलदायक ॥ ४ ॥

और समस्त पुराणो का सारभूत जो उपाय है उसको हम तुमसे कहते हैं। हे राजन् ! दोनों पक्ष की एकादशी के दिन भोजन नहीं करना ॥५॥

जो प्राणी एकादशी के दिन भोजन नहीं करता, वह नरक को नहीं जाता। व्यासजी के वचन को सुनकर कम्पित (कम्पायमान) भीमसेन बोले ॥ ६ ॥

महाबाहु भीमसेन भयभीत होकर वचन बोले कि हे पितामह! मैं अशक्त (असमर्थ) हूँ, इस उपवास के विषय में मैं क्या करू १ ॥ ७ ॥

हे प्रभो ! महान् फलदायक एक व्रत को मुझसे आप कहिये। व्यासजी बोले कि हे भीमसेन ! वृष या मिथुन के सूर्य होने पर ज्येष्ठमास के शुक्लपक्ष मे जो एकादशी होती है ॥८॥

उस दिन प्रयत्नपूर्वक जलरहित उपवास व्रत करना चाहिये, स्नान और आचमन के जल को छोडकर विद्वान् ॥ ९ ॥ अन्य जल का ग्रहण न करे । अन्यथा (स्नान आचमन जल के अलावा) जल का ग्रहण करने से व्रत भङ्ग हो जाता है। विद्वान् सुर्योदय से सूर्योदय तक जल का त्याग कर दे ॥ १० ॥


तो विना प्रयास के एकादशी व्रत का श्रेष्ठ फल उसको मिलता है। बाद द्वादशी के दिन प्रातुःकाल स्नान करे ॥ ११ ॥


और ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करके देवे । इस तरह वह जितेन्द्रिय कृतकृत्य होकर ब्राह्मणों के साथ भोजन करे ॥ १२ ॥


इस प्रकार व्रत करने से जो पुण्य होता है उसे मुझसे जनार्दन भगवान् ने कहा है। ज्येष्ठमास के शुक्लपक्ष की एकादशी के दिन जलरहित (निर्जल) ।॥१३॥


उपवास का जो फल होता है, हे वृकोदर (भीमसेन) उसको तुम सुनो। समस्त दान देने से जो पुण्य, समस्त तीर्थों मे स्नानादि करने से जो पुण्य ॥ १४ ॥


समस्त हवन कर्म करने से जो पुण्य होता है वह पुण्य ज्येष्ठ शुक्ल की एकादशी के दिन उपवास करने से होजाता है। हे वृकोदर! वर्ष के अन्दर शुक्ल अथवा कृष्णपक्ष की जितनी एकादशी होती हैं॥१५॥


वे सव उपवास करने के योग्य है इसमे संशय नहीं है। वे सब एकादशी धन धान्य पुण्य पुत्र और आरोग्य को देने वाली है ॥ १६ ॥


हे नरव्याघ्र ! उन दिनों में उपवास करने से उक्त फल को देती हैं, यह हम तुमसे सत्य कहते हैं। और हे नरव्याघ्र ! एकादशी के दिन उपवास व्रत करने से उस प्राणी के सम्मुख मरणकाल में यमदूत नहीं आते हैं जो कि यमदूत भयानक विशाल काय कृष्णवर्ण दण्ड पाश से युक्त रौद्र (क्रूर) कहे जाते है ॥१७-१८॥


एकादशी के दिन व्रतकर्ता जो वैष्णव है उसको अन्त समय में वैष्णवपुरी (वैकुण्ठ) को ले जाने के निमित्त पीताम्बरधारी सौम्यस्वभाव चक्रधारी और मन के समान वेगशाली षिष्णुदूत वहाँ आते है और उसे वैकुण्ठ ले जाते है ॥१९॥


इसलिये सर्वोपाय से एकादशी का जलरहित व्रत कर और जलधेनु दान देकर प्राणी सब पापों से मुक्त हो जाता है।॥ २०॥


हे नृपश्रेष्ठ ! ज्येष्ठमास के शुक्लपक्ष की जो एकादशी होती ह उस दिन निर्जल उपवास कर अन्न और शर्करा सहित जलपूर्ण घट का। ॥ २१ ॥


दान श्रेष्ठ ब्राह्मण को देकर प्राणी तीनों ताप से छूट जाता हे आर विष्णुलोक में जाकर विष्णु भगवान् के समीप रह कर आनन्द करता है ॥ २२ ॥


इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भाषाटीकायां सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥


क्रमशः...〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ