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बिहार का जल-तंत्र: सभ्यता की जननी और विनाश की विभीषिका

बिहार का जल-तंत्र: सभ्यता की जननी और विनाश की विभीषिका

सत्येन्द्र कुमार पाठक , राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, जीवनधारा नमामि गंगे
बिहार, भारत का वह राज्य है जिसका इतिहास और भूगोल यहाँ की नदियों की धाराओं में समाहित है। गंगा की गोद में बसे इस प्रदेश के लिए नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन की आधारशिला हैं। उत्तर में हिमालय की धवल चोटियों से निकलने वाली वेगवती नदियाँ और दक्षिण में छोटानागपुर के पठार से उतरने वाली शांत किन्तु अनिश्चित नदियाँ मिलकर बिहार को एक विशिष्ट जलीय पारिस्थितिकी प्रदान करती हैं। यह आलेख बिहार के संपूर्ण नदी तंत्र, उनके उद्गम, संगम, महत्व और वर्तमान में उनके अस्तित्व पर मंडराते संकटों का विस्तृत विश्लेषण करता है।
बिहार के मानचित्र को देखें, तो गंगा नदी इसे दो स्पष्ट भौगोलिक क्षेत्रों—उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार में विभाजित करती है। उत्तराखंड के गंगोत्री ग्लेशियर से निकलने वाली गंगा बिहार में बक्सर जिले के चौसा नामक स्थान से प्रवेश करती है। बिहार में गंगा की लंबाई लगभग 445 किलोमीटर है। यह नदी न केवल सिंचाई का मुख्य स्रोत है, बल्कि बिहार के प्रमुख शहर जैसे पटना, मुंगेर, भागलपुर और बक्सर इसी के तट पर स्थित हैं। उत्तर और दक्षिण बिहार की लगभग सभी प्रमुख नदियाँ अंततः गंगा में ही विलीन होती हैं।
उत्तर बिहार की नदियाँ: हिमालयी वेग और बाढ़ का अभिशाप - उत्तर बिहार की नदियाँ नेपाल की हिमालयी श्रेणियों से निकलती हैं। ये नदियाँ 'सदावाहिनी' (Perennial) होती हैं, क्योंकि इन्हें वर्षा के साथ-साथ ग्लेशियरों के पिघलने से भी जल प्राप्त होता है।
घाघरा (सरयू): नेपाल के नांपा (गुरला मंधाता चोटी) से निकलती है। बिहार में यह सिवान और सारण जिलों से होकर बहती है और छपरा के पास गंगा में मिलती है। धार्मिक रूप से इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
गंडक: नेपाल के अन्नपूर्णा पर्वत से निकलती है। यह भैंसालोटन (वाल्मीकिनगर) के पास बिहार में प्रवेश करती है और हाजीपुर के पहलेजा घाट पर गंगा में मिलती है। बूढ़ी गंडक: यह सोमेश्वर की पहाड़ियों से निकलती है। गंडक के समांतर बहते हुए यह मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर और बेगूसराय होते हुए खगड़िया के पास गंगा में मिलती है। यह बिहार की सबसे तीव्र प्रवाह वाली नदियों में से एक है।।नेपाल के गोसाईथान से निकलने वाली कोसी सात धाराओं (सप्तकोशी) के मिलन से बनती है। यह अपने मार्ग बदलने के स्वभाव के कारण कुख्यात है। कटिहार के कुर्सेला के पास गंगा में मिलने वाली यह नदी हर साल उत्तर बिहार में तबाही लाती है।
बागमती: नेपाल की महाभारत श्रेणी से निकलती है और सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर होते हुए कोसी तंत्र में मिल जाती है। महानंदा: दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) की पहाड़ियों से निकलकर किशनगंज और पूर्णिया होते हुए कटिहार में गंगा से मिलती है। यह बिहार की सबसे पूर्वी नदी है।
दक्षिण बिहार की नदियाँ: पठारी स्वभाव और अनिश्चितता - दक्षिण बिहार की नदियाँ छोटानागपुर पठार और विंध्य पहाड़ियों से निकलती हैं। ये नदियाँ 'वर्षाकालीन' (Seasonal) होती हैं। गर्मी के मौसम में इनका जलस्तर अत्यंत कम हो जाता है या ये सूख जाती हैं।सोन नदी: मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलने वाली सोन नदी बिहार की महत्वपूर्ण नदी है। यह रोहतास और औरंगाबाद के बीच सीमा बनाती है और पटना के कोइलवर (दानापुर) के पास गंगा में मिलती है। सोन का बालू पूरे उत्तर भारत में निर्माण कार्य के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। पुनपुन: पलामू (झारखंड) से निकलकर यह औरंगाबाद, अरवल और पटना जिले से होते हुए फतुहा के पास गंगा में मिलती है। हिंदू धर्म में इसका अत्यधिक महत्व है। फल्गु (निरंजना): गया जिले की पहचान फल्गु नदी से है। यह मोहना और निलांजन नदियों के संगम से बनती है। भगवान बुद्ध को इसी नदी के तट पर ज्ञान प्राप्त हुआ था। पितृपक्ष के दौरान यहाँ लाखों लोग पिंडदान के लिए आते हैं।
कर्मनासा: कैमूर की पहाड़ियों से निकलती है। पौराणिक मान्यताओं में इसे 'अपवित्र' नदी माना गया है, जिसके जल के स्पर्श से पुण्य नष्ट हो जाते हैं। किऊल: यह जमुई और लखीसराय की जीवनरेखा है। हजारीबाग से निकलकर यह लखीसराय के पास गंगा में मिलती है। क्षेत्रीय लघु नदियाँ और उनका तंत्र में बिहार के विभिन्न जिलों में ऐसी कई छोटी नदियाँ हैं जो स्थानीय कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
जहानाबाद: यहाँ दरधा, जमुनी और बंदैया नदियाँ बहती हैं । औरंगाबाद: यहाँ आद्री, मदार और बटाने जैसी नदियाँ सिंचाई का आधार हैं। मुजफ्फरपुर: यहाँ लखनदेई और बागमती का विस्तृत जाल है।
गया , जहानाबाद नालंदा: पंचाने और मोहने जैसी नदियाँ यहाँ के 'टाल' क्षेत्रों को सींचती हैं।
विलुप्त और संकटग्रस्त नदियाँ: एक गंभीर पर्यावरणीय चेतावनी है। आधुनिकीकरण, अनियंत्रित बालू खनन और जलवायु परिवर्तन के कारण बिहार की कई गौरवशाली नदियाँ अब केवल मानचित्रों तक सीमित रह गई हैं।
हिरण्यबाहु: यह एक प्राचीन वैदिक नदी है जिसका उल्लेख पौराणिक कथाओं में मिलता है। अरवल जिले का कर पी।, अरवल , कलेर प्रखंड , पटना जिले का पालीगंज प्रखंड और औरंगाबाद (दाउदनगर, हसपुरा) के क्षेत्रों में इसके प्रमाण मिलते हैं, लेकिन आज यह पूर्णतः विलुप्त हो चुकी है
किऊल नदी: जमुई और लखीसराय क्षेत्र में अत्यधिक बालू खनन के कारण इस नदी का तल धँस गया है और यह गर्मी आते ही रेगिस्तान में तब्दील हो जाती है।
लखनदेई: मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी की यह नदी गाद (Silt) और अतिक्रमण के कारण अपना अस्तित्व खो रही है।।गोपालगंज की नदियाँ: वाणगंगा (सासामुसा), सोना (कटेया) और धमई (बरौली) जैसी नदियाँ अब लगभग सूख चुकी हैं या संकरे नालों में बदल गई हैं। पुनपुन और दरधा: प्रदूषण और शहरी कचरे ने इन नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र को पूरी तरह नष्ट कर दिया है।
बिहार का जलग्रहण क्षेत्र लगभग 15,165 वर्ग किमी है। जहाँ उत्तर बिहार बाढ़ (Flood) से जूझता है, वहीं दक्षिण बिहार सूखे (Drought) का सामना करता है । : बिहार के लिए 'कोसी-मेची' और 'सोन-पुनपुन' जैसी नदी जोड़ो परियोजनाएं भविष्य की उम्मीद हैं। गाद प्रबंधन (Silt Management): गंगा और कोसी में जमा होने वाली गाद बिहार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है, जो नदियों की जलधारण क्षमता को कम कर रही है और बाढ़ की तीव्रता को बढ़ा रही है। बालू खनन पर नियंत्रण: दक्षिण बिहार की नदियों को बचाने के लिए अवैध बालू खनन पर पूर्ण प्रतिबंध अनिवार्य है।
बिहार की नदियाँ यहाँ की संस्कृति, अध्यात्म और अर्थव्यवस्था का पर्याय हैं। फल्गु का तट हमें बुद्ध की शांति सिखाता है, तो गंगा का प्रवाह हमें निरंतरता का बोध कराता है। कोसी की विनाशलीला हमें प्रकृति के प्रति सावधान करती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विकास की अंधी दौड़ में इन जीवनवाहनियों को प्रदूषित न करें और विलुप्त हो रही छोटी नदियों के पुनरुद्धार के लिए 'जल-जीवन-हरियाली' जैसे अभियानों को जन-आंदोलन बनाएँ। यदि नदियाँ जीवित रहेंगी, तभी बिहार का अस्तित्व सुरक्षित रहेगा।


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