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"सांध्य-वेला का दृष्टा भाव"

"सांध्य-वेला का दृष्टा भाव"

पंकज शर्मा
​जीवन-रंगमंच पर वृद्धावस्था कोई अवसान नहीं, अपूर्णताओं से परे एक शांत गरिमा का उत्सव है। जब समय की मंद बयार हमें सक्रियता के कोलाहल से धीरे से किनारे करती है, तो वह वास्तव में हमारे भीतर एक सजग 'दृष्टा' को जन्म देती है। भौतिक दौड़ से मुक्त होकर, अनुभवों के शीर्ष पर बैठकर संसार की इस विराट लीला को निहारना एक अलौकिक संतोष देता है। यह सांध्य-काल जीवन की धूप-छांव से परे, आत्मिक शांति की सबसे सुखद और कल्याणकारी अग्रिम दीर्घा है।


​इस पड़ाव पर मनुष्य केवल जीता नहीं, बल्कि जीवन को उसकी संपूर्णता में समझता है। संचित अनुभवों की परिपक्वता से उपजा यह दृष्टिकोण हमें विकारों से मुक्त कर ईश्वरत्व के निकट ले जाता है। जैसी कि कबीरदास जी की यह अमर उक्ति इस अवस्था की आत्मिक शुचिता को दर्शाती है:


​दास कबीर जतन से ओढ़ी,
ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया।


​यह सांध्य-वेला अतीत की स्मृतियों और भविष्य की निश्चिंतता के बीच का वह पावन सेतु है, जहाँ आत्मा अपने मूल स्वरूप को पहचानकर परम आनंद में लीन हो जाती है।


. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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