लता ओट का मिलन
(पुष्प वाटिका प्रसंग)✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
देख छवि सिया सुंदर की,
पलक गिर नहीं पाता।
प्रेम के बंधन में बंधकर
कदम थम वहीं जाता।
गुरु की आज्ञा पाकर दोनों,
पावन उपवन में आए,
चारों ओर खिले सुमन सब,
मनभावन छवि बिखराए।
कलियों के झुरमुट से जैसे,
दिव्य उजाला जग उठता,
रघुवर की सुंदर छवि पर,
लता-पत्ता भी इठलाता॥
देख छवि सिया सुंदर की,
पलक गिर नहीं पाता।
कंगन और नूपुर बजते,
सखियों संग सिया आईं,
गौरी माता के पूजन को,
मन में श्रद्धा भर लाई।
खनक सुन नूपुर की,
रघुवर का मन मुस्काता।
इस अनुपम पावन पल को,
हृदय भूल नहीं पाता ॥
देख छवि सिया सुंदर की,
पलक गिर नहीं पाता।
लता ओट से चकित सिया ने,
जब रघुनंदन को देखा,
थम-सी गई समय की धारा,
नभ ने कौतुक से देखा।
नयनों से नयन मिला जब,
मन का दीपक जल उठा,
इस मूक मिलन के सुख को,
कोई कह नहीं पाता॥
देख छवि सिया सुंदर की,
पलक गिर नहीं पाता।
मुख मंडल देख सिया का,
चंदा भी लज्जित हो जाता,
मर्यादा पुरुषोत्तम का,
मन हर्षित हो जाता।
दोनों के पावन उर में,
प्रीति-सुधा जब लहराई,
नियति के इस सुंदर बंधन को,
कोई बदल नहीं पाता॥
देख छवि सिया सुंदर की,
पलक गिर नहीं पाता।
शुभ मिलन का यह पल,
सदियों तक गाया जाएगा,
गौरी का पावन आशीष,
वर-राम को ही पाएगा।
मन-मंदिर में जो बस जाता,
वही सदा अपना होता,
इस पावन प्रेम की महिमा,
'राकेश' भूल नहीं पाता॥
देख छवि सिया सुंदर की,
पलक गिर नहीं पाता।
प्रेम के बंधन में बंधकर कदम थम वहीं जाता।
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