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चाय की अदाओं पर सारी दुनिया मरती है

चाय की अदाओं पर सारी दुनिया मरती है

कुमार महेंद्र
चाय सिर्फ एक पेय नहीं,
यह अपनत्व की सौंधी खुशबू,
मुस्कानों की मधुर भाषा और
रिश्तों को जोड़ने वाला सुंदर एहसास है।
विश्व चाय दिवस पर समर्पित मेरी स्वरचित कविता —
“चाय की अदाओं पर सारी दुनिया मरती है”
आप सभी स्नेहिल पाठकों को सादर समर्पित। 🙏


(विश्व चाय दिवस — 2026)




अरुणिम उषा की प्रथम किरण संग,
जब चुस्की अधरों पर उतरती है।
मानो जीवन की हर धड़कन में,
नई उमंग मुखरित होती है।
स्नेह-सुगंधित अपनत्वों की,
रसधार सहज ही झरती है।
चाय की अदाओं पर सारी दुनिया मरती है।।


प्रियतम-सी इठलाती चंचल,
मन-मंदिर में राग जगाती।
थके हुए निष्प्राण क्षणों में,
नव उल्लास-दीप जलाती।
मधुर मिलन की कोमल बेला,
हर पीड़ा क्षण में हरती है।
चाय की अदाओं पर सारी दुनिया मरती है।।


मृदुल संवादों की सरिता,
चिंतन-मनन का सुंदर द्वार।
उष्ण स्वभाव, शीतल अनुभूति,
हर लेती अंतस का भार।
हास-परिहासों के मोती,
अधरों पर आकर बिखरती है।
चाय की अदाओं पर सारी दुनिया मरती है।।


कार्यालय हो अथवा उत्सव,
हर आँगन इसका मान बड़ा।
थकन, निराशा, क्लांति मिटाकर,
भर देती नव जीवन-घड़ा।
“अतिथि देवो भव” की गरिमा,
इसके संग ही निखरती है।
चाय की अदाओं पर सारी दुनिया मरती है।।


श्रम-विराम की मधुर सहचरी,
हर आयु-मन की अभिलाषा।
मैत्री-बंधन की सौंधी गाथा,
जीवन-पथ की मधुमय भाषा।
नेह-निमंत्रण की सुगंधित धारा,
चुस्कियों संग सँवरती है।
चाय की अदाओं पर सारी दुनिया मरती है।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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