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"जल से परे"

"जल से परे"

पंकज शर्मा
हम जल के समीप बैठ
सीखते रहे—
कैसे पारदर्शिता
मन की सबसे कठिन तपस्या होती है,
कैसे नमी
केवल स्पर्श में नहीं,
स्मृतियों में भी बची रहती है।


हमने जाना—
प्यास केवल अधरों की नहीं होती,
कुछ रिक्तताएँ
आत्मा के भीतर जन्म लेती हैं।
और प्रेम कभी-कभी
उन सूखे कूपों में उतरता है
जहाँ शब्द भी जल खोजते हैं।


जल ने हमें सिखाया था
गहराइयों का मौन,
कैसे अथाह होकर भी
नदियाँ अपने भीतर
एक स्थिर अँधेरा सँजोए रहती हैं।
ठहराव भी कभी-कभी
बहुत गहरे संगीत रचता है।


किन्तु तुमने
उसी जल से कुछ और ग्रहण किया—
तुमने देखा
कि दिशा बदलना भी
प्रकृति का ही विधान है।
और फिर एक दिन
तुम प्रवाह के साथ चली गईं।


मैं तट की मिट्टी-सा
बहुत देर तक
अपने ही क्षरण को सुनता रहा।
लहरें आती रहीं,
पर उनमें तुम्हारे पाँवों की
पहचान नहीं थी।
सिर्फ़ एक अपरिचित कंपन था।


धीरे-धीरे समझ में आया
कि जल का धर्म
किसी एक घाट पर ठहरना नहीं,
बल्कि दूर समुद्रों तक
अपनी अनकही व्याकुलता ले जाना है।
जो रुक जाए,
वह सरोवर तो हो सकता है, नदी नहीं।


तब मैंने भी
अपने भीतर जमी प्रतीक्षाओं को
धीरे से बहा देना सीखा।
कुछ स्मृतियाँ
पत्थरों की तरह डूब गईं,
कुछ धूप की तरह
जल पर काँपती रहीं।


अब जब वर्षा होती है,
मैं जल को केवल जल नहीं समझता।
उसमें बिछोह का स्वर भी सुनता हूँ,
और मुक्ति का भी।
क्योंकि प्रेम का अंतिम सत्य
शायद यही है—
जो सचमुच गहरा होता है,
वह बाँधता नहीं, बहना सिखाता है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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