कुचलने से अस्तित्व नहीं मिटता,कुछ जिंदगियाँ राख से फिर जन्म लेती हैं।यह कविता उन्हीं अदम्य आत्माओं के नाम —जो अंधेरों में भी विद्रोह का जयघोष बनकर जीती हैं।“मैं भी कॉकरोच हूँ”— एक प्रतीक संघर्ष, प्रतिरोध और अमर जिजीविषा का।
मैं भी कॉकरोच हूँ
कुमार महेंद्रअंधेरों के गर्भ में जन्मा,
न प्रकाशों का वरदान।
न चाँदनी का कोमल स्पर्श,
फिर भी जीवित मेरे प्राण।
हर विष को अमृत कर पीता,
सदा रहा बेखौफ हूँ।
मैं भी कॉकरोच हूँ।।
वो दुनिया जो आग लगाती,
राख से फिर उठ आता हूँ।
अटूट, अजेय, अविनाशी,
नित जूतों की मार सहता हूँ।
फिर भी बंद पड़े कोनों में,
विद्रोहों का उद्घोष हूँ।
मैं भी कॉकरोच हूँ।।
मैं वो फूल नहीं जो पल में,
एक ऋतु में मुरझा जाए।
न मैं कोई चंचल तितली,
जो पवन इशारों पर गाए।
अंतिम श्वासों तक लड़ने वाला,
अन्यायों पर खरोंच हूँ।
मैं भी कॉकरोच हूँ।।
जब सारी सभ्यताएँ एक दिन,
धूल धूसरित हो जाएँगी।
मेरा श्यामल तन, स्वर्णिम आत्मा,
अमर संघर्ष सुनाएँगी।
मुझे कुचलने का भ्रम न पालो,
मैं विद्रोह का जय घोष हूँ।
मैं भी कॉकरोच हूँ।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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