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कलम की स्याही

कलम की स्याही

संजय जैन

जब तक कलम में दम है।
तब तक लिखता रहूँगा।
जीवन के हर पहलू पर।
अपनी विचारों को रखूंगा।।

कलम की स्याही भले ही।
अब आगे सुख जाए।
पर लेखक की स्याही।
मरते दम तक रहेगी।।

आज लिखा कल मिट जायेगा।
ऐसी स्याही से मत लिखना।
छोड़कर जाओंगे जब तुम।
तो आने वाली पीढ़ी पढ़ेगा।।

रफ्तार समय की देखोगें तो।
विखरा हुआ सब दिखेगा।
कही पर कागज कलम पड़ा है।
कही पर जिंदगी के लेख पड़े है।।

सच में मानव जीवन के ये।
मोती न जाने कहाँ कहाँ पड़े है।
जिनको पढ़ना लिखना अब।
किसी के बस की बात नही है।।

जीवन की स्याही का ये ।
राज कोई अलग नही है।
जब तक धड़कन चलती है।
तब तक स्याही सुखती नही।
संजय की ये कविता
खुद में महसूस करो।।

जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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