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"संयम से सौहार्द तक"

"संयम से सौहार्द तक"

 पंकज शर्मा 
प्रिय मित्रों सहनशीलता मनुष्य के अंतर्मन की वह शीतल सरिता है, जो क्रोध की अग्नि को जन्म लेने से पूर्व ही शांत कर देती है। जहाँ धैर्य एवं विवेक का निवास होता है, वहाँ अहंकार का शोर स्वतः क्षीण हो जाता है। क्रोध वस्तुतः भीतर की अस्थिरता का उद्घोष है, जबकि सहनशीलता आत्मबल की निःशब्द अभिव्यक्ति। जो व्यक्ति परिस्थितियों को संयम से स्वीकारना सीख लेता है, उसके जीवन में संघर्ष भी सौम्यता का रूप धारण कर लेते हैं।


टकराव केवल विचारों का नहीं, अपितु असंयमित प्रतिक्रियाओं का परिणाम होता है। जब मन शांत होता है, तब संबंध टूटते नहीं, बल्कि अधिक परिपक्व होते हैं। बिखराव वहीं जन्म लेता है जहाँ संवाद समाप्त हो जाता है। सहनशीलता हमें यह बोध कराती है कि जीवन विजय का नहीं, समरसता का नाम है; और जो स्वयं को साध लेता है, वही संसार को भी सहज बना देता है।


. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
 पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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