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ज्येष्ठ मास महात्मय {छब्बीसवां अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {छब्बीसवां अध्याय}

लेखक: आनन्द हठीला
स्कन्दजी ऋपियों से बोले और व्यासजी राजा युधिष्ठिर से बोले कि हे नृप ! तदनन्तर बहुत समय बीत जाने पर नारद ऋषि का कहा हुआ वह समय आ गया ।॥ १ ॥

हे राजन् ! नारद ऋषि ने जो कुछ कहा था वह उस सावित्री के हृदय में निरन्तर बना रहता था और सावित्री प्रतिदिन समय की गणना किया करती थी ।॥ २ ॥

बाद तीन रात्रि का व्रत आरम्भ कर दिनरात एक आसन से बैठ गई और चौथे दिन इस नियम की समाप्ति करूंगी, ऐसा निश्चय किया ॥ ३ ॥

राजा द्युमत्सेन अपनी पुत्रवधू का दु.ख-साध्य नियम सुनकर दुखी हो गये, और उठकर 'स्वयं सावित्री से श्रेष्ठ बचन बोले ॥ ४ ॥

राजा द्युमत्सेन बोले कि हे राजपुत्रि ! तुमने यह अति कठिन नियम का आरम्भ किया है ॥ ५ ॥

स्कन्दजी ऋषियों से कहते है कि तीन दिन का समय बहुत दुश्चर (दुःख से बिताने के योग्य) है, हे विप्र ! उस दिवस को पति के मृत्यु का कारण जानकर ॥ ६॥

इसके बोच में उस मनस्विनी ने तीन दिन का नियम ग्रहण किया और चतुर्थ दिन हे सुने! आज के दिन सत्यवान् मरेगा ॥ ७॥

इसी समय सत्यवान् कुठार और पिटक (पिटारी) लेकर वन के लिये चला, उस सत्यवान् को वन जाते देखकर सावित्री बोली ॥ ८ ॥

कि हे मानद ! आज मेरे कहने से आप वन को न जांय, अथवा हे साधो ! यदि आप जाना चाहते है तो मेरे साथ वन को चले ॥ ९ ॥

हे प्रभो ! इस आश्रम में वाप्त करते एक वर्ष पूर्ण हो गया ॥ १० ॥

सत्यवान् बोले कि हे सुश्रोणि! मैं स्वतन्त्र नही हूँ, मेरे माता पिता से पूछो । हे शुचिस्मिते ! यदि वे लोग चलने को कहें तो मेरे साथ चलो ॥ ११ ॥

पति के ऐसा कहने पर वह कमलनेत्रा सास श्वसुर के समीप गई और उनके चरणों को प्रणाण कर बचन बोली ॥ १२ ॥

कि मैं वन देखने के निमित्त जाना चाहती हूँ, आप मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये । और वह पतिव्रता बोली कि आप मुझे एक वर दीजिये ॥ १३ ॥

मेरा मन पति के साथ वन को जाने के लिये कह रहा है। सावित्री के वचन को सुनकर राजा द्युमत्सेन यह बात बोले ॥ १४ ॥

द्युमत्सेन ने कहा कि हे भद्रे ! हे सुव्रत! तुमने व्रत किया है अब उस व्रत का पारण करो । आथवा हे भीरु ! पारण के बाद तुम वन को जा सकती हो ॥ १५ ॥

सावित्री बोली कि हे तात ! मैंने रात्रि में चन्द्रोदय होने पर भोजन का नियम किया है, हे तात ! और मेरी वात सुनिये ॥१६॥

आज मै पति के साथ वन देखना चाहती हूँ, हे नराधिप ! पति के साथ मुझे वन में ग्लानि (कष्ट न होगी ॥ १७ ॥

यह बात सुनकर राजा द्युमत्सेन बोले कि हे पुत्रि! हे सुमध्यमे ! जो कुछ तुम चाहती हो उसको तुम करो ॥ १८ ॥

हे सुनि-श्रेष्ठ ! हे प्रभो ! सावित्री सास श्वशुर को प्रणाम कर सत्यवान् के साथ वन को गई ॥ १९ ॥

और समय समय पर वह मनस्विनी पति को देखा करती थी, और विकसित पुष्प वाले वृक्ष तथा फलित वृक्षों से व्याप्त वन को देखती थी ।। २० ।।

उस वन के वृक्ष तथा मृग विशेष के नामों को पूछती हुई और मृगसमूह को देखती हुई वह सावित्री हृदय से कांप रही थी ॥ २१ ॥

उस वन मे जाकर सत्यवान् ने शीघ्र फलों को लेकर और काष्ठ को भी लिया और एक भार (बोझा) बांध कर तैयार किया ॥ २२ ॥

वह साध्वी पतिव्रता वट वृक्ष के समीप बैठकर पिटक (पेटारी) को फलों से पूर्ण करने लगी ॥ २३ ॥

और सत्यवान् उन काष्ठों को कुठार से फाडने लगा, इस समय सत्यवान् के शिर मे वेदना होने लगी ।। २४ ।।

सत्यवान् सावित्री से बोला कि हे भद्रे ! शूल के समान काटों से मेरा शिर फट रहा है, हे सुश्रोणि ! हे सुव्रते । मैं तुम्हारे गोद मे सुतना चाहता हूँ ।। २५ ।।

विशालाची मनस्विनी सत्यवान् की मृत्यु का समय उपस्थित समझ कर वह भामिनी उसी स्थान मे बैठ गई ।। २६ ।।

सत्यवान् भी सावित्री के गोद मे शिर रखकर सो गया, तबतक वहाँ पर एक कृष्णपिङ्गल वर्ष का पुरुप आया ॥ २७ ॥

इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भापाटीकायां षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

क्रमशः...
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