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सूरज उगले आग

सूरज उगले आग

अरुण दिव्यांश

भाग भाग धूप से भाग ,
दिवा अजगर सा नाग ,
जल रहे जैसे ये बाग ,
देख सूरज उगले आग ।
ग्रीष्म हो गया है प्रचंड ,
वृक्ष कर्तन का यह दंड ,
कहे मौसम मनुज से ,
मानव तुझे बड़ा घमंड ।
निज घमंड के कूप में ,
घिरे पड़े आज धूप में ,
जैसे सामने खड़ा धूप ,
साक्षात् यम के रूप में ।
झेल मानव अब झेल ,
देख प्रकृति का खेल ,
तलाते रहो खूब धूप में ,
ज्यों हो खौलता तेल ।
प्रकृति से उलझ रहे हो ,
अग्नि में झुलस रहे हो ,
फॅंस रहे स्वयं दलदल में ,
क्यों नहीं सुऋझ रहे हो ।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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