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अधरों की आस, प्रिय आओ पास

अधरों की आस, प्रिय आओ पास

कुमार महेंद्र
अधरों की मौन पुकार में छिपा है प्रेम का गहन स्वर…
प्रतीक्षा की हर धड़कन बस एक ही नाम जपती है—
“प्रिय, अब तो आओ पास…”


नेह-प्रकृति अद्भुत अनुपम,
हृदय-अंतर बिछोह-वेदना।
विस्मृत-सी निज पहचान,
शून्य हुई सब चेतना।
छवि निहार आनंद अनुभूति,
नयनों में अविरल अश्रु-विलास।
अधरों की आस, प्रिय आओ पास।।


विश्रांति-कक्ष गहन सन्नाटा,
दीपक-लौ स्नेह-मंद प्रखर।
निशा-जागृति स्वप्निल सीमा,
हर आहट प्रिय-दर्शन अधर।
प्रतीक्षा-पल विराट स्वरूप,
अंतःकरण पावन उजास।
अधरों की आस, प्रिय आओ पास।।


अथाह धधक रहा तन-मन,
मौन हुए सब हाव-भाव।
काया भटके गृह-सीमा में,
आत्मा खोजे तेरा ठांव।
सारे सौंदर्य-श्रृंगार अधूरे,
पायल-स्वर करे क्रंदन आभास।
अधरों की आस, प्रिय आओ पास।।


प्रतीक्षा-अंतर साधना-ज्योति,
प्रिय-आगमन मंगल कामना।
अंतःकरण प्रणय-निर्झर बहता,
दर्शन-तृषित हर आराधना।
परिणय-भावना सजीव स्पंदन,
हर पल रचे मिलन उल्लास।
अधरों की आस, प्रिय आओ पास।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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