मनुस्मृति और भारतीय संविधान भाग - 12 ख
परमेश्वर का न्याय और दया
डॉ राकेश कुमार आर्य
हमारे देश में स्वतंत्रता के पश्चात कानून में शिथिलता बरतने के अनेक अवसर देखे गए हैं। न्याय और दया दोनों को गलत अर्थ में प्रयोग किया गया है। परमपिता परमेश्वर जीवों को उनके किए का फल देता है तो यह उसका न्याय भी होता है और यह उसकी दया भी होती है। दया इसलिए है कि वह न्याय के माध्यम से उनके किए हुए बुरे कर्मों का फल देकर उन्हें एक बार फिर संभलने का अवसर प्रदान करता है।
हमने अनेक बार आतंकवादियों पर दया दिखाई और उन्हें बिना दंड दिए छोड़ दिया। कई राजनीतिक दलों ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए अथवा अपने लिए राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए देशद्रोही आतंकियों को क्षमादान दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि आतंकवाद और भी अधिक बढ़ा। जबकि होना यह चाहिए था कि आतंकियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए थी। जिससे आमजन को राहत मिलती।
....तब धर्म की पराजय होती है
जब कानून आतंकवाद के सामने हथियार फेंक देता है, तब धर्म पराजित होता है और कानून व्यवस्था भंग होती है। विधि प्राण छोड़ जाती है। हमने मनु की व्यवस्था के विरुद्ध जाकर जब आतंकवादियों और राष्ट्रद्रोहियों का समर्थन करना आरंभ कर दिया तो सर्वत्र अशांति फैल गई। देश की सरकारों को हमने आतंकवाद और आतंकवादियों के सामने झुकता देखा, अपराध और अपराधियों के सामने पानी भरते देखा। इससे पूरे देश में अराजकता का परिवेश बना। उसी का परिणाम है कि आज वैश्विक आतंकवाद की स्थिति से हम सब दो चार हैं।अली सिना अपनी पुस्तक ‘ अंडरस्टैंडिंग मुहम्मद और मुस्लिम ‘ में लिखते हैं कि 11 सितंबर सन 2001 के बाद 13 वर्षों में 24300 आतंकी हमले हुए । परिणामस्वरुप पूरे संसार में सैकड़ों हजारों नागरिकों की मृत्यु हुई और चोट पहुंची । औसतन प्रतिदिन पांच आतंकी हमले हुए। आक्रमणकारी अपराधकर्ता कोई दैत्य नहीं थे, अपितु मुसलमान ही थे। अपने मजहब में उनका विश्वास था और उसके अनुसार ही उन्होंने यह काम किया । ऐसी ही सोच वाले दसियों करोड़ और भी हैं , जो वह सब भी वही करने के लिए तैयार बैठे हैं। वह लिखते हैं कि इस्लाम अपनी सफलता के लिए आतंकवाद का ही ऋणी ( इस बात को इस्लाम के लोग भी भली प्रकार जानते हैं कि आतंकवाद के कारण ही वह संसार में अपनी संख्या बढ़ाने में सफल हुए हैं।इसलिए उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह आतंकवाद के रास्ते को छोड़कर शांति के रास्ते पर आकर काम करना चाहेंगे) है।
विद्वान लेखक की इस बात में बहुत ही बल है कि ‘ इस्लाम आतंकवाद का ऋणी है।’ आज जितने भर भी देशों में इस्लाम का परचम लहरा रहा है, वहां कभी सनातनी हिंदुओं का वर्चस्व था। धीरे-धीरे सनातन के लोगों में जड़ता ने प्रवेश किया और वे कई स्थानों पर दोराहे की बजाए चौराहे पर आते चले गए। उनकी किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति का लाभ इस्लाम और ईसाई मत के लोगों ने कहीं तलवार से तो कहीं प्यार से, कहीं बहला फुसलाकर तो कहीं लालच देकर उठाने में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी।
इस्लाम, आतंकवाद और दण्ड
इतिहास इस बात का साक्षी है कि इस्लाम ने आतंकवाद के माध्यम से लोगों का भयादोहन करके ही अपना विस्तार किया है। जब तथ्य चीख चीखकर सच्चाई को बयां कर रहे हों, तब भी कुछ लोग यदि यह न।कहें कि इस्लाम और आतंकवाद का चोली दामन का साथ है तो निश्चित रूप से उनकी बुद्धि पर तरस ही आता है।अली साहब हमें बताते हैं कि मदीना में अपना कदम रखने के साथ ही मोहम्मद ने अपने आतंक का अभियान आरंभ कर दिया था, तब से उनके अनुयाई भी यही करते चले आ रहे हैं।भारतीय मान्यता में किसी पर घात लगाकर हमला करना नैतिकता और मानवता के विरुद्ध है, जबकि इस्लाम इसे जायज मानता है। वीरता इसी में है कि शस्त्रयुक्त व्यक्ति से ही युद्ध किया जाए । इतना ही नहीं, जिस पर जैसा हथियार है वैसा ही हथियार वाला व्यक्ति उससे युद्ध करे।जब 10 वर्ष में 24300 आतंकी हमलों का एक कीर्तिमान एक वर्ग विशेष के लोगों के नाम अंकित हो और प्रतिदिन पांच आतंकी हमले संसार में हो रहे हों , तब विश्व शांति की बात करना कितना उचित हो सकता है ?- यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
जब इस्लाम को मानने वाले लोग अपराध और आतंकवाद के माध्यम से संसार में अराजकता उत्पन्न कर रहे थे, तब उनके राजनीतिक नायक उन्हें इन्हीं दोनों कामों के लिए उकसा रहे थे। यदि वे राजनीतिक नायक लोग सचमुच में मनुस्मृति के अनुसार राजा के गुणों से संपन्न होते तो वे कदापि अपराधी और आतंकवादियों को अराजकता उत्पन्न करने के लिए प्रेरित नहीं करते ,इसके विपरीत वे उन्हें दण्डित करते।
" यह तथ्य और भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोग प्रतिदिन की पांच आतंकवादी घटनाओं को लगभग जीवन का एक अनिवार्य अंग मान चुके हैं । तभी तो इतने निर्मम अत्याचारों पर कोई चर्चा नहीं होती। चर्चा को पूर्व नियोजित योजना के अंतर्गत इस प्रकार विषयांतरित कर दिया जाता है कि आतंकवादी का कोई मजहब नहीं होता और आतंकवाद इस्लाम की मूल भावना के विपरीत है। टी0वी0 चैनलों पर या समाचार पत्रों में इस विषय में जो भी चर्चाएं होती हैं, उनमें कितने ही लोग आपको इसी प्रकार के विमर्श के इर्द-गिर्द घूमते या लेख लिखते हुए या चर्चा करते हुए मिल जाएंगे। इस प्रकार सत्य को मिट्टी में मिला दिया जाता है और अपराधी को भी मानव मानकर उसके अधिकारों का समर्थन करने के लिए लोग उठ खड़े होते हैं।
गजवा, सरिया औरआतंकवाद
इसका परिणाम यह आता है कि गजवा , सरिया और आतंकवाद के आधार पर काम करने वाले लोग निसंकोच अपने मिशन में लगे रहते हैं।इसके लिए धर्म परिवर्तन के नाम पर लोगों को भेड़ की भांति मूंडा जाता है । लोगों की फटेहाली, गरीबी और लाचारी का लाभ उठाकर उनकी आत्मा का सौदा किया जाता है। पहले तो उन्हें शांति और उन्नति के सपने दिखाए जाते हैं, फिर उनके सपनों को निर्ममता से रौंदकर उनसे बेगार ली जाती है। उन्हें नारकीय जीवन जीने के लिए अकेला छोड़ दिया जाता है।
यदि संसार के सभी न्याय शास्त्री अथवा धर्मशास्त्री ईमानदारी से विधि , कानून व्यवस्था और धर्म के परस्पर समन्वय संबंध पर बैठकर चर्चा करें और यह मत प्रतिपादित करें कि ये तीनों गहनता से एक साथ जुड़े हुए हैं और इनका अन्योन्याश्रित संबंध है तो सभी लोग इस बात को बड़ी सहजता से समझ जाएंगे कि धर्म का पालन करना ही कानून व्यवस्था में विश्वास रखना है और कानून व्यवस्था में विश्वास रखना ही विधि का पालन करना है। तब लोगों को यह भी समझ में आ जाएगा कि जिसे हम मजहब कहते हैं, वह मजहब धर्म नहीं है। धर्म का अभिप्राय सर्व समाज की उन्नति के प्रति अपने आप को समर्पित करना होता है, जबकि संप्रदाय का अभिप्राय किसी वर्ग विशेष के लोगों के प्रति अपने आप को प्रतिबद्ध दिखाना होता है। ऐसे लोगों के लिए उनकी इस प्रकार की प्रतिबद्धता शेष समाज के लिए अभिशाप बन जाती है। ऐसे लोग धर्म को मारने वाले होते हैं इसलिए धर्म इनको मारता है।
महर्षि मनु के अनुसार राजा का राजधर्म
राजा को आतंकवाद के सामने झुकना नहीं चाहिए। उसे आतंकवाद और आतंकवादियों का डटकर सामना करना चाहिए। यही उसका राष्ट्रधर्म है।
महर्षि मनु के अनुसार राजा के लिए आवश्यक है कि :-
तं देशकालौ शक्तिं च विद्यां चावेक्ष्य तत्त्वतः।
यथार्हतः सम्प्रणयेन्नरेष्वन्यायवर्तिषु ॥( वि० म० )
अर्थात देश, समय, शक्ति और न्याय अर्थात् अपराध के अनुसार न्यायोचित दण्ड का ज्ञान, इन सब बातों को ठीक-ठीक विचार कर अन्याय का आचरण करने वाले लोगों में उस दण्ड को यथायोग्य रूप में प्रयुक्त करे।
दण्ड का महत्त्व -
स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः। चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ १७॥
जो दण्ड है वही पुरुष राजा वही न्याय का प्रचारकर्ता और सबका शासनकर्ता वही चार वर्ण, चार आश्रमों के धर्म का प्रतिभू अर्थात जामिन जिम्मेदार है।
मनु महाराज की इन व्यवस्थाओं के अनुसार आज हमें अपने संविधान की समीक्षा करनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि यह संविधान देशद्रोही और आतंकवादियों के विरुद्ध ऐसी कौन सी कठोर कार्यवाही करने का प्रावधान करता है, जिससे वह देश के कानून का पालन करने और धर्म का पालन करने के प्रति अपने आप को समर्पित कर सकते हैं ?
संविधान का अभिप्राय केवल राजनीतिक व्यवस्था संबंधी धाराओं या अनुच्छेदों को स्थापित कर देना नहीं है, इसका अभिप्राय विधि, कानून - व्यवस्था और धर्म की व्यवस्था को देखना भी है। संविधान के भीतर ही ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए और संविधान के माध्यम से ही ऐसा स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि देश और समाज के विरुद्ध अथवा विधि, कानून व्यवस्था और धर्म की व्यवस्था के विरुद्ध कार्य करने वाले लोगों को समाज और राष्ट्र का शत्रु माना जाएगा। जिनके विरुद्ध न केवल राज्य अपने स्तर पर कठोर कानूनी कार्यवाही करेगा अपितु जनसाधारण को भी अधिकार होगा कि वह भी राष्ट्र विरोधी और समाज विरोधी शक्तियों का सामना करने में राज्य का सहयोग करेगा।
संविधान में दण्ड की व्यवस्था का अर्थात राज्य की ओर से कठोरता का संदेश देने वाली धाराओं को स्थान देना बहुत आवश्यक है। हम लोकतंत्र के नाम पर मानवाधिकार आयोग जैसे संगठन बनाएं, महिला आयोग बनाएं, अल्पसंख्यक आयोग बनाएं और उनमें बैठे लोगों के अनुसार कानून न्याय करते समय न्याय का गला घोंटने का काम करे तो इससे कभी भी राष्ट्र का भला नहीं हो सकता। क्योंकि इस प्रकार के आयोगों में बैठने वाले लोग पहले से ही अपने आपको किसी वर्ग विशेष के प्रति पूर्वाग्रही बना लेते हैं। राज्य को न तो किन्हीं लोगों को मानवाधिकार आयोग के क्षेत्राधिकार में भेजना है,न महिला आयोग के क्षेत्राधिकार में भेजना है और न किसी अल्पसंख्यक आयोग के क्षेत्राधिकार में भेजना है, उसे तो सबको अपने क्षेत्राधिकार में रखना है और सब के साथ समान न्याय करना है। ये जितने भर भी आयोग देश में बने हुए हैं ,ये सारे के सारे जोंक की भांति चिपक कर राष्ट्र का खून चूस रहे हैं और न्याय करने में भी राज्य को अन्याय के लिए उकसाते देखे जाते हैं। विभिन्न प्रकार के एक्ट बनाकर अथवा कानून बनाकर भी यदि हम आतंकवाद की कमर नहीं तोड़ पा रहे हैं तो समझ लीजिए कि कहीं न कहीं नियत में खोट है और कहीं न कहीं कोई ऐसी बाधा बीच में आ रही है जो आतंकवाद की कमर नहीं तोड़ने दे रही है।
इसी प्रकार कितने ही प्रकार के आयोग बनाकर, कितने ही प्रकार के आरक्षण संबंधी प्रावधान बनाकर भी यदि हम समाज में सद्भाव नहीं बना पा रहे हैं और निरंतर जातीय विद्वेष फैलता जा रहा है तो मानना पड़ेगा कि कहीं ना कहीं भारी चूक हो रही है। इसका अभिप्राय है की नीतियों में अनीति है , अधर्म है, अत्याचार और अन्याय की भावना है। शासन प्रशासन में बैठे लोगों की सोच में कहीं न कहीं सांप्रदायिकता या जातिवाद है।
मनुस्मृति में व्यवस्था की गई है कि:-
यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः ॥
भावार्थः यदि राजा ( किसी भी कारण से ) दण्डित किए जाने योग्य ( अपराधी अथवा आतंकवादी अथवा देशद्रोही ) दुर्जनों के ऊपर दण्ड का प्रयोग नहीं करता है, अर्थात उन्हें कठोर दंड नहीं देता है तो बलशाली व्यक्ति अर्थात समाज के शक्तिशाली लोग दुर्बल लोगों को वैसे ही पकाऐंगे जैसे शूल अथवा सींक की मदद से मछली पकाई जाती है ।"
यहां पर भी मनु महाराज राजा के लिए सीधे आदेश कर रहे हैं कि उसे बिना किसी प्रमाद के अपराधी को दंड देने में किसी भी प्रकार का विलंब नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से उसके राज्य में शांति व्यवस्था बनी रहेगी। आपराधिक मानसिकता के लोगों का मनोबल टूटा रहेगा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हमारे देश की सरकारों ने आतंकवादियों का भी पक्ष पोषण किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि देश में अराजकता का परिवेश बनता चला गया।
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।
दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥
भावार्थः " यह संसार दण्ड ( आतंकवादियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करने के उपरांत ) के द्वारा ही जीते जाने योग्य है, अर्थात् दण्ड के द्वारा ( आतंकवादी देशद्रोही लोगों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्यवाही करके ) ही इसे नियंत्रण में रखा जा सकता है । ऐसा व्यक्ति दुर्लभ है जो स्वभाव से ही साफ-सुथरा एवं सच्चरित्र हो, न कि दण्ड के भय से । दण्ड के भय से ही वह व्यवस्था बन पाती है जिसमें लोग अपनी संपदा का भोग कर पाते हैं ।"
नोट : यह लेख मेरी पुस्तक ' मनुस्मृति और भारतीय संविधान' से लिया गया है । यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई है।
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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