जिंदगी के हो तुम माली
अरुण दिव्यांशजिंदगी के हो तुम माली ,
क्यूॅं देते जिंदगी को गाली ।
जिंदगी ही तेरा यह उषा ,
जिंदगी ही प्रभात लाली ।।
जिंदगी ही प्रभा छटा है ,
जिंदगी ही तेरा यह रवि ।
सॅंवार दे तू नित्य इसको ,
जिंदगी तेरा सुंदर छवि ।।
चलने दे तू नित्य निरंतर ,
रुकने का अर्थ अस्त है ।
जिंदगी ही तेरा सुंदरता ,
जिंदगी अर्थ ही व्यस्त है ।।
अस्त का अस्तित्व कहाॅं ,
अस्त का है पतित्व कहाॅं ।
अस्त तो है स्वयं ही अस्त ,
अस्त का सतीत्व कहाॅं ।।
जिंदगी के हो तुम माली ,
ईश जिंदगी मालिक है ।
जिंदगी सजाओ सॅंवारो ,
जिंदगी वही पालित है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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