जिनगी के कहानी ।
का कहीं जिनगी के कहानी ,हमरा देह अब लसारत बा ।
धोबी के पाट धोबी अईसन ,
ध के हमरा खॅंचकारत बा ।।
जीयब चाहे नाहिए त मरब ।
मर के जाईब हम कब ऊपर ,
या जिनगीए में हम सड़ब ।।
एक बेर बचलीं कोरोना से ,
दोसरे पीलिया बहल धारा ।
एही में गोल ब्लेडर पथरी ,
दिने में गिनीं नभ के तारा ।।
तीसरे अब दिल के बेमारी ,
ना केहूओ से प्यार भईल ।
बुढ़ापा में मनवो बुढ़ाईल ,
दिल दौरा बारंबार भईल ।।
मनवा ईमानवा का भूलाई ,
जब प्रीत हो गईल रीत से ।
कभी खुशी कभी गम के ,
शेयर करिले हर मीत से ।।
शनीचर से भईलीं पीड़ित ,
फलेरिया जाड़ बोखार से ।
का कहीं आपन ई हालत ,
पीड़ित प्राकृतिक मार से ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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