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"शून्य में लौटती हुई आवाज़ें"

"शून्य में लौटती हुई आवाज़ें"

पंकज शर्मा
एक दिन—
जब समय ने जेब टटोली
और वहाँ कोई स्क्रीन नहीं थी,
केवल स्पर्श की एक आदत थी,
जो बार-बार उँगलियों में काँपती रही—
जैसे स्मृति भी अब उपकरणों पर आश्रित हो गई हो।


प्रातः का आलोक उतरा,
पर जागरण अधूरा रहा—
न कोई संदेश, न कोई आहट,
सिर्फ़ भीतर का एक सूना कोना
जो पूछता रहा—
क्या मैं स्वयं से भी इतना दूर हो चुका हूँ?


मन, जो सूचना के प्रवाह में बहता था,
अचानक एक स्थिर जलाशय बन गया—
जहाँ विचार,
अपनी ही परछाइयों से टकराकर
लौट आते हैं,
और मौन का वृत्त और गहरा हो जाता है।


घर के भीतर
चेहरों ने पहली बार एक-दूसरे को पढ़ा—
बिना किसी मध्यस्थ के।
शब्द हिचकिचाए,
पर आँखों ने धीरे-धीरे
संवाद का पुराना व्याकरण पुनः रच लिया।


बच्चे आँगन की धूप में उतरे,
जहाँ खेलों की कोई ऐप नहीं थी—
केवल मिट्टी थी,
और उस पर उकेरे गए अस्थायी स्वप्न।
माँ की पुकार अब नोटिफिकेशन नहीं,
एक जीवित संबंध बनकर गूँजी।


पर बाहर—
सड़कें अब भी भाग रही थीं,
समाचार ठिठके हुए थे,
और समाज,
अपनी ही गति के अभाव में
एक क्षण के लिए स्वयं को देखता रह गया।


यह अभाव केवल सुविधा का नहीं था,
यह उस तंत्र का विघटन था
जिसमें हमने अपने समय,
अपनी स्मृति और अपनी पहचान
सौंप दी थी—
एक चमकती हुई निर्जीव सतह को।


और अंततः—
उस एक दिन के शून्य में
कुछ आवाज़ें लौट आईं,
जो वर्षों से दब गई थीं।
शायद मनुष्य अब भी शेष है—
यदि वह स्क्रीन से परे
अपने भीतर झाँक सके।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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