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धर्मारण्य से गया जी तक: मोक्ष की पावन धरा

धर्मारण्य से गया जी तक: मोक्ष की पावन धरा

सत्येन्द्र कुमार पाठक
मगध की धरती केवल साम्राज्यों के उत्थान और पतन की मूक गवाह नहीं रही है, बल्कि यह वह केंद्र है जहाँ मानव चेतना ने जन्म, मृत्यु और मोक्ष के गूढ़ रहस्यों को सुलझाया। गया जी, जिसे प्राचीन काल में 'धर्मारण्य' कहा जाता था, वह ५ वर्ग कोश (१५ वर्ग किमी) का वह पावन अंतगृही क्षेत्र है, जहाँ की धूल का हर कण ऋषियों की तपस्या और पूर्वजों के उद्धार की गाथा कहता है। ऋषि उरुवेला और धर्मारण्य का उदय में गया का इतिहास सतयुग के उस कालखंड से प्रारंभ होता है जब यह क्षेत्र घने वनों से आच्छादित था और इसे 'धर्म का वन' यानी धर्मारण्य कहा जाता था। ऋषि उरुवेला: शास्त्र और विज्ञान के पुंज है । पौराणिक संदर्भों में महर्षि कश्यप के वंशज ऋषि उरुवेला का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें वेदों, उपनिषदों और पुराणों का प्रकांड ज्ञाता माना गया है। उरुवेला केवल कर्मकांडों तक सीमित नहीं थे; वे अपने समय के महान खगोलशास्त्री और प्रकृति के रहस्यों के विशेषज्ञ भी थे। जहानाबाद के पास स्थित उर्वला पर्वत आज भी उनके नाम और तपस्या की साक्षी दे रहा है। उन्होंने समाज को धर्म के साथ-साथ विज्ञान और अनुशासन की शिक्षा दी।
गयासुर और मोक्ष का वरदान - गया की महिमा गयासुर के प्रसंग के बिना अधूरी है। असुर संस्कृति के राजा होने के बावजूद गयासुर की पवित्रता ऐसी थी कि स्वयं देवताओं को उनके शरीर पर यज्ञ करना पड़ा। भगवान विष्णु के गदाधर रूप में यहाँ स्थित होने और गयासुर के मस्तक पर स्थिर होने से यह भूमि 'मोक्ष द्वार' बनी। यहाँ सौर, शाक्त, शैव और वैष्णव संस्कृतियों का जो अनूठा संगम मिलता है, वह विश्व में अन्यत्र दुर्लभ है। नदियों और पर्वतों का आध्यात्मिक भूगोल में गया की भौगोलिक संरचना केवल भूविज्ञान नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक मानचित्र है।
नदियाँ में निरंजना, मोहने और फल्गु जहाँ निलांजन (निरंजना) और मोहने नदी का संगम होता है, वही बिंदु आध्यात्मिक ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। इसके बाद यह धारा 'फल्गु' कहलाती है। फल्गु का 'अंतःसलिला' होना (सतह के नीचे बहना) त्याग और अंतर्मुखी साधना का प्रतीक है।
ब्रह्मयोनि पर्वत समूह: यह पर्वत समूह सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी का अधिष्ठान माना जाता है। इसके साथ ही विष्णु गिरि, ( भगवान विष्णु का वास ) भस्म गिरि ( माता मंगलागौरी का वास) और प्रेत शिला (यमराज का स्थान) मिलकर गया के आध्यात्मिक सुरक्षा चक्र का निर्माण करते हैं। फल्गु नदी के किनारे विष्णुपद , मंगलागौरी , पितामहेश्वर , ब्राह्मणी घाट पर विरांची नारायण , बंगला स्थान , बागेश्वरी , रामशिला , ब्रह्म सरोवर , रामसरोवर , कठोतर सरोवर , मार्कण्डेय , प्रेतशिला , सूर्यमंदिर अक्षयवट आदि तीर्थ स्थल वही बौद्ध धर्म का बौद्धि मंदिर है ।
बुद्ध काल: ज्ञान और वैराग्य की वैश्विक क्रांति - छठी शताब्दी ईसा पूर्व में गया ने एक नया मोड़ लिया। जब सिद्धार्थ गौतम ने निरंजना के तट पर उरुवेला कश्यप के आश्रमों को अपनी साधना के लिए चुना, तो यह प्राचीन ऋषि संस्कृति और नवीन बौद्ध दर्शन के मिलन का बिंदु बना। बुद्ध काल में गया के सामाजिक ढांचे में क्रांतिकारी परिवर्तन आए। सुजाता और बाकतौर (पशुपालन संस्कृति) से जुड़ी कथाएँ बताती हैं कि ज्ञान अब केवल गुफाओं तक सीमित नहीं था, वह जन-सामान्य की करुणा और प्रेम में भी था। बुद्ध ने गया की पहाड़ियों पर अपना प्रसिद्ध 'अग्नि उपदेश' दिया, जिसने वैराग्य की नई परिभाषा लिखी।
गया के पत्थर बोलते हैं। यहाँ प्राप्त शिलालेख मौर्य काल से लेकर पाल काल तक के इतिहास को संजोए हुए हैं।
ब्रह्मयोनि पर्वत की गुफाओं में ब्राह्मी लिपि के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं, जो मौर्य प्रशासन की पारदर्शिता को दर्शाते हैं। वहीं, यहाँ की चट्टानों पर 'शंख लिपि' (Shell Script) के घुमावदार अक्षर मिलते हैं, जो अपनी कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध हैं। यद्यपि यह लिपि आज भी पूरी तरह पढ़ी नहीं जा सकी है, पर यह गुप्त काल के सौंदर्यबोध का प्रतीक है।
गया की गुफाओं (विशेषकर बराबर और लोमश ऋषि समूह) में पत्थरों पर जो शीशे जैसी चमक है, उसे 'ओपदार पॉलिश' कहा जाता है। २३०० वर्षों बाद भी यह पॉलिश वैसी ही चमकती है, जो उस समय के मगध के उच्च कोटि के इंजीनियरिंग और केमिकल विज्ञान का प्रमाण है। मगध के राजाओं ने गया को हमेशा एक 'विशिष्ट स्वायत्त क्षेत्र' माना। कौटिल्य के अर्थशास्त्र और विभिन्न गुप्तकालीन ताम्रपत्रों से यहाँ की प्रशासनिक बारीकियों का पता चलता है
राजाओं द्वारा दिए गए दान-पत्रों में "अ-चट-भट प्रवेश्य" जैसे शब्द मिलते थे, जिसका अर्थ था कि दान की गई भूमि पर सेना या पुलिस का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। यह भूमि की पूर्ण पवित्रता और स्वायत्तता को सुनिश्चित करता था।
यहाँ के प्रशासन के लिए 'अमात्य', 'अक्षपटलिक' (लेखाकार) और 'दूतक' जैसे पदों पर नियुक्ति के लिए 'उपधा-परीक्षण' (ईमानदारी की परीक्षा) होती थी। अधिकारियों को नकद वेतन (पण में) और भूमि अनुदान दोनों मिलते थे, ताकि वे भ्रष्टाचार मुक्त होकर तीर्थ की मर्यादा की रक्षा कर सकें।
मुगल काल और अहिल्याबाई: मुगल काल के संघर्षों के बाद, १८वीं शताब्दी में इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर ने विष्णुपद मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार कराया। यह गया के इतिहास में सनातन संस्कृति के पुनरुद्धार का स्वर्ण काल था।
ब्रिटिश काल: अंग्रेजों के समय रेलमार्ग के विकास ने गया जी को वैश्विक तीर्थयात्रियों से जोड़ दिया। कनिंघम जैसे विद्वानों ने यहाँ के पुरातात्विक महत्व को दुनिया के सामने रखा। आधुनिक काल: आज गया जी एक वैश्विक केंद्र है जहाँ शोधकर्ता, जिज्ञासु और पितृ-मुक्ति की कामना रखने वाले लोग पूरे विश्व से आते हैं। मगध विश्वविद्यालय और अंतरराष्ट्रीय मठों ने यहाँ की शैक्षणिक और आध्यात्मिक परंपरा को जीवित रखा है।
ज्ञान , मोक्ष और आध्यात्म संस्कृति का महाकुंभ गया जी केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक 'जीवित संस्था' है। यहाँ ऋषि उरुवेला का शास्त्र ज्ञान है, बुद्ध का वैराग्य है, अशोक की धम्म-लिपि है और अहिल्याबाई की भक्ति है। सतयुग का धर्मारण्य आज भी आधुनिक युग में 'मोक्षदायिनी गया' के रूप में हमें अपने जड़ों से जोड़ता है। यह भूमि हमें सिखाती है कि संस्कृतियाँ बदल सकती हैं, शासन बदल सकते हैं, लेकिन 'ज्ञान' और 'मुक्ति' की खोज मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य बनी रहती है। गया का कण-कण, फल्गु की धारा और ब्रह्मयोनि के शिलालेख इसी शाश्वत सत्य के प्रमाण हैं।संदर्भ: वायु पुराण: गरुड़ पुराण गया महात्म्य खंड। कौटिल्य: अर्थशास्त्र (प्रशासनिक शब्दावली)। गया डिस्ट्रिक्ट गजेटियर 1906 ,1957,भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की शोध रिपोर्टें। क्षेत्रीय लोक कथाएँ और उरुवेला कश्यप की ।


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