ज़रा सोचो, आज हम कहाँ खड़े हैं

ज़रा सोचो, आज हम कहाँ खड़े हैं

कुमार महेंद्र
सर्वत्र भौतिक चकाचौंध,
कृत्रिम प्रगति भाग-दौड़।
मृग-मरीचिका सी ध्येय की राह,
अंध प्रतिस्पर्धा व्यर्थ होड़।
संबंध अंतर स्वार्थ अथाह,
परस्पर व्यवहार अकड़े हैं।
ज़रा सोचो, आज हम कहाँ खड़े हैं।।


नैसर्गिकता परे जीवन शैली,
अनियमित आचार-विचार।
सत्य पथ कष्ट-कंटक पूर्ण,
संवाद पटल पर उग्र आवेश-धार।
स्नेह, प्रेम, भाईचारा ज्योत मंद,
अंतःकरण द्वेष-घृणा जकड़े हैं।
ज़रा सोचो, आज हम कहाँ खड़े हैं।।


निज संस्कृति संस्कार विलोप,
परंपरा मर्यादा उपेक्षित छोर।
चिंतन-मनन अनैतिक बिंदु,
दृष्टि अंतर वासना की ठौर।
गिद्ध दृष्टि वनिता जात-गात,
वैचारिकी वासना भाव उमड़े हैं।
ज़रा सोचो, आज हम कहाँ खड़े हैं।।


प्रकृति दोहन चरम बिंदु,
पर्यावरण प्रति संचेतना अभाव।
समाज-राष्ट्र हित पश्च कदम,
आदर संकट वरिष्ठजन छाँव।
दया, करुणा, सहयोग ओझल,
सर्वत्र मानवता पैर उखड़े हैं।
ज़रा सोचो, आज हम कहाँ खड़े हैं।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ , https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ