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“मोबाइल की दुनिया बनाम पुस्तकों का भविष्य: बच्चों के समय का सही निवेश”

“मोबाइल की दुनिया बनाम पुस्तकों का भविष्य: बच्चों के समय का सही निवेश”

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

आज का समय तकनीक का समय है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने जीवन को जितना सरल बनाया है, उतना ही जटिल भी। विशेषकर बच्चों के संदर्भ में यह एक गंभीर चिंता का विषय बन चुका है कि वे अपना अधिकांश समय मोबाइल स्क्रीन पर व्यतीत कर रहे हैं। यदि यही समय पुस्तकों के अध्ययन में लगाया जाए, तो न केवल उनका बौद्धिक विकास होगा, बल्कि उनका भविष्य भी अधिक उज्ज्वल और सुदृढ़ बन सकता है।

मोबाइल आज केवल एक साधन नहीं रहा, बल्कि एक आकर्षण का केंद्र बन गया है। गेम, सोशल मीडिया, वीडियो और त्वरित मनोरंजन के साधनों ने बच्चों को इस कदर जकड़ लिया है कि वे वास्तविक दुनिया से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं। यह स्थिति केवल समय की बर्बादी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके मानसिक, सामाजिक और नैतिक विकास को भी प्रभावित कर रही है। ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी, अधीरता, और त्वरित संतुष्टि की आदत—ये सब मोबाइल के अत्यधिक उपयोग के दुष्परिणाम हैं।

इसके विपरीत, पुस्तकें एक शांत और गहन साथी होती हैं। वे केवल जानकारी ही नहीं देतीं, बल्कि सोचने की शक्ति, कल्पनाशीलता और विवेक को भी विकसित करती हैं। एक अच्छी पुस्तक बच्चे को न केवल ज्ञान देती है, बल्कि उसे जीवन के मूल्यों से भी परिचित कराती है। जब बच्चा पढ़ता है, तो वह स्वयं के भीतर एक नई दुनिया का निर्माण करता है—जहां विचारों की गहराई होती है और समझ का विस्तार होता है।

पुस्तकें बच्चों को धैर्य सिखाती हैं। एक-एक पृष्ठ पढ़ते हुए वे धीरे-धीरे विषय को समझते हैं, जिससे उनकी एकाग्रता और विश्लेषण क्षमता बढ़ती है। इसके विपरीत, मोबाइल पर मिलने वाली त्वरित जानकारी उन्हें सतही ज्ञान तक सीमित कर देती है। वे जान तो लेते हैं, पर समझ नहीं पाते। यही अंतर भविष्य में उनकी निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है।

यह कहना भी गलत नहीं होगा कि मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों को एक आभासी दुनिया में कैद कर रहा है, जहां वास्तविक अनुभवों की कमी होती है। वे न तो प्रकृति से जुड़ पाते हैं, न ही सामाजिक संबंधों की गहराई को समझ पाते हैं। जबकि पुस्तकें उन्हें इतिहास, संस्कृति, विज्ञान और समाज के विविध पहलुओं से जोड़ती हैं, जिससे उनका व्यक्तित्व संतुलित और परिपक्व बनता है।

यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि तकनीक स्वयं में दोषपूर्ण नहीं है। मोबाइल भी ज्ञान का एक सशक्त माध्यम हो सकता है, यदि उसका उपयोग संतुलित और उद्देश्यपूर्ण ढंग से किया जाए। परंतु जब यह मनोरंजन और व्यसन का रूप ले लेता है, तब यह विकास में बाधा बन जाता है। इसलिए आवश्यक है कि बच्चों को मोबाइल के उपयोग की सीमाएं सिखाई जाएं और उन्हें पुस्तकों के प्रति आकर्षित किया जाए।

अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका यहां अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि वे स्वयं पढ़ने की आदत अपनाएं और बच्चों के लिए एक सकारात्मक वातावरण तैयार करें, तो बच्चे भी स्वाभाविक रूप से पुस्तकों की ओर आकर्षित होंगे। घर में एक छोटा सा पुस्तकालय, नियमित पढ़ने का समय, और पुस्तकों पर चर्चा—ये छोटे-छोटे प्रयास बच्चों के भविष्य को नई दिशा दे सकते हैं।

अंततः, यह समझना आवश्यक है कि आज के बच्चे ही कल का समाज और राष्ट्र बनाते हैं। यदि उनका समय केवल मोबाइल स्क्रीन पर बीतेगा, तो उनका विकास अधूरा रह जाएगा। लेकिन यदि वही समय पुस्तकों के साथ बिताया जाए, तो वे ज्ञान, विवेक और संस्कार से परिपूर्ण नागरिक बनेंगे।


समय का सदुपयोग ही भविष्य का निर्माण करता है। इसलिए यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम बच्चों को सही दिशा दिखाएं—जहां मोबाइल साधन हो, और पुस्तकें उनके जीवन की सच्ची साथी।

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