Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

“चुप्पी का शोर”

“चुप्पी का शोर”

डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
मतला
चुप रहूँ तो भी झलकता है असर का शोर,
मेरी ख़ामोशी में छुपा है मुक़र्रर का शोर।

लब सिले हैं तो ये मतलब नहीं झुक जाऊँ,
मेरे अंदर ही मचलता है हुनर का शोर।

देखने वाले समझ लें मेरी ख़ामोशी को,
मेरी नज़रों में ही होता है मुखर का शोर।

वक़्त के सामने झुकना मुझे आता ही नहीं,
चुप ही रहकर भी सुनाता हूँ उत्तर का शोर।


जो मुझे कमज़ोर समझें, वो ग़लतफ़हमी में,
मेरे सन्नाटे में पलता है समर का शोर।
मक़ता
"राकेश" की ख़ामोशी को हल्का न समझो तुम,
इसमें ही गूँजता रहता है असर का शोर।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ