“चुप्पी का शोर”

“चुप्पी का शोर”

डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
मतला
चुप रहूँ तो भी झलकता है असर का शोर,
मेरी ख़ामोशी में छुपा है मुक़र्रर का शोर।

लब सिले हैं तो ये मतलब नहीं झुक जाऊँ,
मेरे अंदर ही मचलता है हुनर का शोर।

देखने वाले समझ लें मेरी ख़ामोशी को,
मेरी नज़रों में ही होता है मुखर का शोर।

वक़्त के सामने झुकना मुझे आता ही नहीं,
चुप ही रहकर भी सुनाता हूँ उत्तर का शोर।


जो मुझे कमज़ोर समझें, वो ग़लतफ़हमी में,
मेरे सन्नाटे में पलता है समर का शोर।
मक़ता
"राकेश" की ख़ामोशी को हल्का न समझो तुम,
इसमें ही गूँजता रहता है असर का शोर।
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