“निष्कलंक मुद्रा”
✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"👉 बहर: फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलुन
👉 रदीफ़: “दोस्तों”
👉 क़ाफ़िया: इल्ज़ाम / बदनाम /मुकाम/ निष्काम/ काम / नाकाम / इन्सान आदि
मतला
मुद्रा पे क्यों लगाते हो इल्ज़ाम दोस्तों,
दाग़ी हैं अपने कर्म, हुए नाकाम दोस्तों।
गंदी गलियों से होकर भी निर्मल ही वो रही,
इन्सान की नीयत हुई बदनाम दोस्तों।
उस पर लहू के छींटे, धूल और गर्द भी,
फिर भी न खो सकी वो कभी मुकाम दोस्तों।
मंदिर में चढ़ रही है, मजारों पे सज रही,
हर रूप में श्रेष्ठ वो, सदा रही निष्काम दोस्तों।
पेटों की आग जब भी भड़कती है तेज़-सी,
इन्सान कर बैठता है हर काम दोस्तों।
हवसों के फेर में जो गिरा हद से भी परे,
मुद्रा नहीं, वो खुद हुआ नाकाम दोस्तों।
रोज़ी का एक साधन है, रस्ता भी ढूँढ ले,
मुद्रा न भटकी, भटका है निज़ाम दोस्तों।
मक़ता
“राकेश” जान लीजिए, सच है यही पैग़ाम,
मुद्रा नहीं, गलत हैं इंसाँ के काम दोस्तों।
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