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"कल्पनाशील मन का मध्य-बिंदु"

"कल्पनाशील मन का मध्य-बिंदु"

पंकज शर्मा
यह कल्पनाशील मन क्या है—
पलायन की एक शरणस्थली,
या अदृश्य की ओर खुलता
एक सूक्ष्म, अनाम द्वार?
जहाँ प्रत्यक्ष की सीमाएँ टूटती हैं,
और अर्थ नया आकार लेता है।

मैं स्वयं से पूछता रहता हूँ—
जब यह मन कुछ रचता है,
तो क्या वह भ्रम गढ़ता है,
या किसी अप्रकट सत्य की
मद्धिम आहट को सुनता है?
जो दिखता नहीं, क्या वही सत्य है?

कभी यह कल्पना बहकती है—
यथार्थ की कठोर भूमि से हटकर,
संभावनाओं में भटकती रहती है।
पर क्या यह भटकन ही दोष है,
या इसी में छिपा है वह बीज,
जहाँ सृजन पहली बार धड़कता है?

मन दो छोरों के बीच झूलता है—
तथ्य की सीमित रेखाएँ एक ओर,
और कल्पना का असीम विस्तार।
इन दोनों के बीच ठहर पाना,
क्या संतुलन की स्थिति है,
या केवल एक क्षणिक विराम?

यदि कल्पनाशील मन मौन हो जाए,
तो भीतर क्या शेष रहेगा?
एक यांत्रिक, निर्जीव-सा क्रम,
जो देखता है, स्वीकार करता है,
और बिना किसी प्रश्न के
उसी को दोहराता चला जाता है।

पर यदि केवल कल्पना ही बचे,
तो क्या वह धरातल से कट जाएगी?
जहाँ अर्थ का आधार ढह जाता है,
और हर विस्तार अंततः
अपने ही भार तले दबकर
शून्य में विलीन हो जाता है।

तो क्या यह कल्पनाशील मन ही
न बंधन है, न ही मुक्ति—
बल्कि एक मध्य-पथ की खोज है?
जहाँ अनुभव और संभावना मिलकर
एक-दूसरे में घुलते रहते हैं,
और एक नई अनुभूति रचते हैं।

शायद, 'कमळ'—
कल्पना कोई विलास नहीं है,
बल्कि अस्तित्व की एक धारा है।
जिसमें डूबकर यह मन
अपने सीमित वर्तमान से आगे
अर्थ और सत्य की उस
अनिश्चित झिलमिलाहट को छूता है।

. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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