श्रम
अरुण दिव्यांशदिन के पीछे रात बनी है ,
रात के पीछे बना दिन ।
दिन बना है यह श्रम को ,
रात बनी है केवल नीन ।।
श्रम बिन है भोजन नहीं ,
श्रम बिन कहाॅं ये नीन ।
श्रम होत जीवन सुख है ,
श्रम बिन स्वास्थ्य विहीन ।।
सुख पश्चात दुख बना है ,
दुख पश्चात बना सुख ।
स्वसुख की ही चाह यह ,
बना स्वयं का यह दुख ।।
मन नहीं जब पावनता ,
प्यार न जब तक मुख ।
सुख का वह क्षण कहाॅं ,
श्रम से हुए जो विमुख ।।
श्रम यह जीवन गीत है ,
श्रम ही है जीवन जीत ।
श्रम यह जीवन हित है ,
तू श्रम से लगा ले प्रीत ।।
श्रम से तू प्रीत लगा ले ,
श्रम बना जीवन मीत ।
श्रम बने स्वास्थ्य रक्षक ,
श्रम स्वास्थ्यवर्धक घृत ।।
श्रम में नहीं लोभ क्रोध ,
श्रम में नहीं ईर्ष्या द्वेष ।
श्रम ही है जीवन प्यारा ,
श्रम बिन भरा अवशेष ।।
श्रम कर्म में है शर्म कहाॅं ,
श्रम कर्म है जीवन क्रम ।
मन का संशय निकाल दे ,
बाहर कर जीवन भ्रम ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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