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शून्य के प्रणेता आर्यभट्ट आधुनिक विज्ञान का आधार हैं |

शून्य के प्रणेता आर्यभट्ट आधुनिक विज्ञान का आधार हैं |

सत्येन्द्र कुमार पाठक
जहानाबाद । प्राचीन भारत के महानतम गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट की जयंती के पावन अवसर पर आज देश भर में उन्हें याद किया जा रहा है। इसी क्रम में सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक ने आर्यभट्ट के जीवन और उनके कालजयी आविष्कारों पर प्रकाश डालते हुए एक विस्तृत वक्तव्य जारी किया है। श्री पाठक ने कहा कि आर्यभट्ट केवल एक वैज्ञानिक नहीं, बल्कि उस भारतीय मेधा के प्रतीक थे जिसने उस समय दुनिया को दिशा दिखाई जब शेष विश्व अंधकार में था। सत्येन्द्र कुमार पाठक ने रेखांकित किया कि आर्यभट्ट द्वारा रचित 'आर्यभटीय' ग्रंथ गणित और खगोल विज्ञान का वह आधार स्तंभ है, जिस पर आज की आधुनिक गणनाएं टिकी हैं। उन्होंने कहा: "आर्यभट्ट ने ही दुनिया को 'शून्य' (0) का उपहार दिया। यदि शून्य न होता, तो आज न तो कंप्यूटर की बाइनरी कोडिंग संभव होती और न ही अंतरिक्ष विज्ञान की जटिल गणनाएं।" इतिहासकार पाठक ने आर्यभट्ट के उन प्रमुख सिद्धांतों पर चर्चा की जिन्हें पश्चिमी वैज्ञानिकों ने सदियों बाद खोजा: आर्यभट्ट ने ईसा पूर्व ही यह सिद्ध कर दिया था कि पृथ्वी स्थिर नहीं है, बल्कि अपनी धुरी पर घूमती है। उन्होंने बताया कि ग्रहण राहु-केतु के कारण नहीं, बल्कि पृथ्वी और चंद्रमा की छाया के कारण होते हैं। π (पाई) का सटीक मान: उन्होंने पाई का मान 3.1416 बताया था, जो आधुनिक मान के अत्यंत निकट है।त्रिकोणमिति : ज्या और कोज्या के मूलभूत सिद्धांतों का प्रतिपादन भी उनकी महान देन है।सत्येन्द्र कुमार पाठक ने इस बात पर जोर दिया कि नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास और आर्यभट्ट जैसे विभूतियों के बारे में शिक्षित करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि: आर्यभट्ट ने सिद्ध किया कि विज्ञान और अध्यात्म भारत में एक साथ चलते थे। : बिहार के प्राचीन कुसुमपुर (वर्तमान पटना) में स्थित उनकी वेधशाला भारतीय मेधा का केंद्र थी। आज के वैज्ञानिकों को आर्यभट्ट के साहस और तर्कशक्ति से सीखना चाहिए, जिन्होंने उस समय प्रचलित रूढ़ियों को चुनौती दी थी। श्री पाठक ने आह्वान किया कि आर्यभट्ट की जयंती को केवल एक तिथि के रूप में नहीं, बल्कि 'भारतीय वैज्ञानिक चेतना दिवस' के रूप में मनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम अपनी प्राचीन विरासत का सम्मान करें और शोध (Research) के क्षेत्र में भारत को पुनः विश्व गुरु के स्थान पर प्रतिष्ठित करें।"
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