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तुम मुझे कब तक रोकोगे?

तुम मुझे कब तक रोकोगे?

कुमार महेंद्र
हिय में दृढ़ संकल्प-ज्योति,
लक्ष्य-बिंदु सदा अचल।
मिटा कथनी-करनी का अंतर,
अथक श्रम, साधना निष्कल।
कष्ट-कंटक बनकर राहों में,
कितनी शक्ति अब झोंकोगे?
तुम मुझे कब तक रोकोगे?


शमन कर नैराश्य-क्रोध-ज्वाला,
नव आशा-उमंग संचार।
अप्रतिम जोश, उत्साह-तरंगें,
अन्याय पर प्रखर प्रहार।
व्यंग्य-कटाक्ष भरी तालियां,
पीठ पीछे कब तक ठोकोगे?
तुम मुझे कब तक रोकोगे?


मानवता-उत्थान, सेवा-भाव,
रग-रग में सरिता सा बहता।
नित अग्रसर राष्ट्रधर्म-पथ पर,
मर्यादा में जीवन रहता।
पुनीत-पावन कर्म-पथ से,
कितनी बार मुझे टोकोगे?
तुम मुझे कब तक रोकोगे?


आत्मविश्वास संग मैत्री-बंधन,
कदम बढ़ें सफलता की ओर।
उर-भावनाएँ शुभ-मंगलमयी,
प्रयास रहे हरदम पुरजोर।
देख मेरी क्षितिज-भेदी उड़ानें,
अब किस सीमा तक चौंकोगे?
तुम मुझे कब तक रोकोगे?


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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