भेड़ खाल में चोर उचक्के, कानून के रक्षक,
अहिंसक खुद को बतलाते, हिंसा के संरक्षक।न्यायाधीश और अपराधी, सिक्के के दो पहलू,
सफेदपोश दलाल बने कुछ, मानवता के भक्षक।
जितना जूता उतनी पॉलिश, सिद्धांत बना इनका,
आतंकवादियों का हित ही, अभियान बना इनका।
धर्म जाति तो निर्बल की होती, इनकी जाति पैसा,
संविधान संरक्षण मिलना, अभिमान बना इनका।
कितनी पीढ़ियाँ निपट गयी, न्याय पाने खातिर,
लूट खसोट न्यायालय में, तारीख़ पाने खातिर।
आतंकी की बात अगर हो, आधी रात भी तत्पर,
भाई भतीजों का संरक्षण, रुतबा पाने खातिर।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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